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भज़न 12

12
मज़त मांगणा लै अरज़
गाज़ै-बाज़ै आल़ेए सैणैं लै खर्ज रागा दी राज़ै दाबेदो भज़न
1हे बिधाता, ज़ीबाण मेरी मज़त कर!
एथ निं एक मणछ बी भलअ रहअ,
मानदार मणछ निस्सै तोप्पी करै बी भेटी।
2सोभै बोला एकी-दुजै का झ़ुठअ!
एकी-दुजै लै हआ तिन्‍नें होठै होर अर कोठै होर!
3हे बिधाता, तिन्‍नें ठगणै आल़ै होठा अर
डिंगा मारनै आल़ी ज़िभा पा काटी।
4तिंयां बोला इहअ, “हाम्हां ज़ितणअ ज़िभे ज़ोरै,
हाम्हां बोल़णअ ज़िहअ म्हारअ दिल च़ाहा तिहअ
अर हाम्हां निं कुंण रोक्‍की सकदअ, नां म्हारअ कुंण मालक आथी।”
5पर हे बिधाता, तूह बोल तिन्‍नां लै इहअ,
“गरीब मणछ आणै हंती-हंती मारी
अर छ़ुटै-मुक्‍कै दै लान्हैं लागै लेरदै,
मुंह करनी तिन्‍नें फाज़त ताकि तिंयां राज्ज़ी-मौज़ी रहे।”
6हे बिधाता, तेरी ज़बान हआ पाक्‍की,
सह हआ च़ोखी च़ंदी ज़ेही
ज़ेथ आरनैं साता बारी हआ पाण दैनी दी।
7-8हे बिधाता, हाम्हां का आसा थोघ
तूह करा हारी-मारी आणै दै मणछे फाज़त,
तिन्‍नां डाहा तूह सदा लै एऊ ज़मानें लोगा का बच़ाऊई।
च़ाऐ कदुष्ट मणछ ज़ेतरै बी कल़ेल़ै किल्है निं फिरे अर
सारै देशै बूराईए ज़ै-ज़ैकार किल्है निं होए हंदी लागी दी।

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भज़न 12: OSJ

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