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भज़न 120

120
बिधाता का मज़त मांगणा लै अरज़
1खरीए पलका पाई मंऐं बिधाता सेटा पकार,
तेऊ शूणीं मेरी अरज़।
2हे बिधाता, तूह डाह मुंह शल़ैघा घल़णै आल़ै अर
छ़ल़-कपट करनै आल़ै मणछा का बच़ाऊई।
3ओ झ़ुठअ बोल़णैं आल़ै मणछो, बिधाता ताल्है किज़ै करनअ?
तम्हां लै तेऊ केतरी बडी सज़ा दैणीं?
4तम्हैं बिन्हणै तिछै कतीरा करै,
संघा दहणैं आगीए नारे कूंडा दी।
5तम्हां मांझ़ै बस्सणै का आसा मेशक देशे लोगा जैंदरी
अर कदार मुल्खे लोगा जैंदरी परदेसी ज़िहै बस्सणअ भलअ।
6मुंह हुई तिन्‍नां मणछा संघै रहंदी खास्सी साला
ज़ुंण मेल़-ज़ोल़ा का नफरत करा।
7हुंह, च़ाहा तिन्‍नां संघै मेल़-ज़ोल़ करनअ पर
तिंयां करा मेरै गल्‍ला करदी मुंह संघै झ़गल़अ।

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भज़न 120: OSJ

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