परमेश्वर को पहला स्थान देंSample

"परमेश्वर आपके हृदय में पहला स्थान चाहता है"
आज के समाज में, कई लोग धन पर अपना मूल्य रखते हैं, कि वे "सामाजिक सीढ़ी" पर कितनी ऊँचाई पर हैं, " उनका व्यवसाय कितना सफल है, या यहां तक कि वे किन लोगों को जानते हैं।
लेकिन अगर इन चीजों पर हमारे महत्व का दृष्टिकोण स्थापित किया जाता है, तो जब हम इन क्षेत्रों में बढ़ने लगते हैं तो केवल अपने बारे में ही अच्छा महसूस करेंगे। जब हमारी संपत्ति और सफलता कम हो जाती है, तो हमारा आत्म-मूल्य भी कम होगा क्योंकि हमारा आधार ठोस नहीं है। यीशु ने इस तरह से इसका वर्णन किया है:
“परन्तु जो सुनकर नहीं मानता, वह उस मनुष्य के समान है, जिस ने मिट्टी पर बिना नेव का घर बनाया। जब उस पर धारा लगी, तो वह तुरन्त गिर पड़ा, और वह गिरकर सत्यानाश हो गया॥" लूका 6:49
हमारी पहचान केवल उतनी ही ठोस होती है जितनी कि जिस नींव पर हम इसे रखते हैं। यीशु मसीह रूपी ठोस चट्टान के नींव पर हमारी पहचान स्थापित करने से, जीवन में संपूर्णता की हमारी भावना अस्थायी चीजों की बदलती स्थिति पर निर्भर नहीं होगी।
जब मसीह हमारी नींव है, तो हमारी स्थिरता इस तरह होती है:
“वह उस मनुष्य के समान है, जिस ने घर बनाते समय भूमि गहरी खोदकर चट्टान की नेव डाली, और जब बाढ़ आई तो धारा उस घर पर लगी, परन्तु उसे हिला न सकी; क्योंकि वह पक्का बना था।" लूका 6:48
जीवन में उन कई विकल्पों के विषय में एक पल के लिए सोचें जिनपर आपको अपने महत्व की नींव को बनाना पड़ सकता है। इनमें धन, व्यवसाय, रूप, परिवार, प्रसिद्धि, शक्ति या आप किन्हें जानते हैं, आदि शामिल हो सकते हैं। क्या कुछ अन्य बातें हैं जिनके बारे में आप सोच सकते हैं? हमारी पहचान स्थापित करने के लिए सभी चीजों में से, केवल यीशु ही हमें विजयी मसीही जीवन का आश्वासन देता है।
परन्तु यदि आप अन्य विकल्पों की जांच करते हैं, तो कोई भी बुरा या स्वाभाविक रूप से बुरा नहीं है। यहाँ तक कि, कई मामलों में, वे जिम्मेदारी के बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र होते हैं जो परमेश्वर ने हमें हमारे जीवन में दिया है। लेकिन मत्ती की पुस्तक में, यीशु हमें संतुलन को पाने में मदद करता है।
"इसलिये मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिये यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिये कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं? आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते।" मत्ती 6:25-26
जब हम अपने जीवन में इस सत्य को हल कर लेते हैं, तो हम शांति और सम्पूर्णता को पाते है जो चिंता और निराशा से मुक्त होती है। यह संतुलन तब प्राप्त होता है जब हम यीशु को अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में पहले स्थान में रखते हैं।
"इसलिये पहिले तुम उसके राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी।" मत्ती 6:33
हम सभी के पास सपने, लक्ष्य और आकांक्षाएं होती हैं क्योंकि परमेश्वर ने हमें ऐसा ही बनाया है। लेकिन यीशु को पहले स्थान पर रखना आपको अपनी प्राथमिकताओं और उद्देश्यों की जांच करने में अगुवाई करनी चाहिए कि आप अपनी इच्छाओं को पूरा करने या प्राप्त करने की इच्छा क्यों रखते हैं। जब वह आपके सपनों और आकांक्षाओं में पहला होगा, तो आपका भविष्य महानता और खुशी से भरा होगा!
जब परमेश्वर आपके ध्यान में एक सवालिया उद्देश्य लाता है, तो आपकी सबसे महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया बदलाव करने की इच्छा होनी चाहिए। बदलाव कई बार मुश्किल हो सकता है, लेकिन परमेश्वर के मन में हमारे लिए हमेशा सबसे अच्छा ही होता है, और चाहता है कि आप आत्मिक रूप से बढ़ें।
About this Plan

परमेश्वर को अपने जीवन में पहला स्थान देना एक बार की कोई घटना नहीं है... यह हर मसीही के लिए जीवनभर की एक प्रक्रिया है। चाहे आप विश्वास में नए हों या मसीह के "अनुभवी" अनुयायी हों, आपको यह योजना समझने और लागू करने में आसान लगेगी और जयवंत मसीही जीवन के लिए एक बेहद प्रभावी रणनीति मिल जाएगी। डेविड जे. स्वांत द्वारा लिखी गयी पुस्तक, "आउट ऑफ़ दिस वर्ल्ड: ए क्रिश्चियन्स गाइड टू ग्रोथ एंड पर्पस" से लिया गया।
More
Related Plans

After Your Heart

Wisdom for Work From Philippians

A Heart After God: Living From the Inside Out

Create: 3 Days of Faith Through Art

Out of This World

Unbroken Fellowship With the Father: A Study of Intimacy in John

Uncharted: Ruach, Spirit of God

The Revelation of Jesus

Journey Through Leviticus Part 2 & Numbers Part 1
