मन की युद्धभूमिSample

पवित्र भय
जब यहोशापात राजा बना तब यहूदा एक बहुत ही छोटा देश था और आस पास के देश अराम से बड़ी आसानी से उसे पराजित कर सकते थे। हम सीखते हैं कि राजा ने बहुत से सुधार कार्य पूर्ण किये। बाइबल उन बचनों के विवरण करते हुए कहती है, ‘‘इसके बाद मोआबियों और अम्मोनियों ने और उनके साथ कई मूनियों ने युद्ध करने के लिये यहोशापात पर चढ़ाई की।'' (20:1)।
राजा के लिये सब से महत्वपूर्ण बात यह था कि वह अपने आपको दूसरे के अधिनता में दे और किसी प्रकार के समझौते पर हस्ताक्षर करे। ऐसा कोई मानवीय रास्ता नहीं था कि ऐसा छोटा देश बड़ी सेनाओं को हरा सके। इस संदर्भ में हम पढ़तें हैं कि राजा डरा हुआ था और वह क्यों न डरे? लेकिन वह डर के साथ रूका नहीं रहा।
मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहती हूँ। भय महसूस करना पाप या अनाज्ञाकारिता नहीं है। वास्तव में हम यह सोचकर ऐसा ही करते हैं कि भय हमें एक चेतावनी के तरह होता है। यह खतरे की सूचना होती है।
परन्तु तब हमें यह निर्णय करना होता है कि हम भय के साथ किस प्रकार व्यवहार करेंगे। हम कार्य कर सकते हैं; हम घिसर सकते हैं, या हम उसे अनदेखा कर सकते हैं। राजा यहोशापात ने सही काम किया। ‘‘तब यहोशापात डर गया और यहोवा की खोज में लग गया, और पूरे यहूदा में उपवास का प्रचार करवाया। (20ः3)। उसके पास उत्तर नहीं था, और निश्चय ही इतना मूर्ख भी नहीं था कि यह सोचे कि ऐसी छोटी सी सेना उसके शत्रुओं को हरा सकती है। और यह हमारे सिखने के लिये एक महत्वपूर्ण सबक है शैतान के विरूद्ध हमारे युद्ध में। हमारा शत्रु शक्तिशाली है और यदि हम सोचते हैं कि हम स्वयं उसे हरा सकते हैं, तो हम मूर्ख हैं और बुरी तरह गलतफहमी में फंसे हुए हैं।
राजा ने न केवल प्रार्थना किया बल्कि सारे देश में उपवास की घोषणा कर दी। बाइबल आगे वर्णन करती है कि वह लोगों के बीच में खड़ा हुआ और छुटकारे के लिये प्रार्थना किया। ‘‘हे हमारे परमेश्वर, क्या तू उनका न्याय न करेगा? यह जो बड़ी भीड़ हम पर चढ़ाई कर रही है, उसके सामने हमारा तो बस नहीं चलता और हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करना चाहिये? परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं।'' (20:12)।
ऐसी ही प्रार्थना परमेश्वर सुनना चाहता है। उन्होंने अंगिकार किया कि उन्हें नहीं मालूम था कि क्या करना चाहिये। वे जीत नहीं सकते थे और उनकी एक मात्र आशा परमेश्वर की मुक्ति में थी।
ठीक उसी समय परमेश्वर का आत्मा यहजीएल नामक एक व्यक्ति पर आया। तब वह कहने लगा, ‘‘हे सब यहूदियों, हे यरूशलेम के रहनेवालो, हे राजा यहोशापात, तुम सब ध्यान दो; यहोवा तुम से यों कहता है, ‘तुम इस बड़ी भीड़ से मत डरो और तुम्हारा मन कच्चा न हो; क्योंकि युद्ध तुम्हारा नहीं, परमेश्वर का है।'' (20:15)। वह आगे कहता रहा, कि तुम्हें इस युद्ध में लड़ने की आवश्यकता नहीं है। तुम अपना स्थान ग्रहण करो, फिर खड़े रहो और परमेश्वर की छुटकारे को देखो जो तुम्हारे साथ है। डरो मत और तुम्हारा मन कच्चा न हो। (पद 17)। यह वर्णन आगे कहती है कि लोग परमेश्वर की स्तुति में गीत गाने लगे। जब उन्होंने ऐसा किया तब परमेश्वर ने सैर की पहाड़ी से यहूदा की शत्रुओं को नाश करने के लिये योद्धा भेजे और कोई भी बच न सका।
शत्रु के विरूद्ध युद्ध जीतने का यह एक बड़ा रहस्य है। आप अपने भय को कबूल करे—आप उसे पवित्र भय कह सकते हैं। क्योंकि यह आपको परमेश्वर को खोजने के लिये कहता है। यदि आप सच में भयग्रस्त नहीं हैं और अपने समस्याओं को स्वयं से बढ़कर नहीं देखते हैं तो आप क्यों परमेश्वर को सहायता के लिये पुकारेंगे? किन्तु जब यह छलकने लगता है तब आप समझते हैं कि आपको ईश्वरीय सहायता की आवश्यकता है। यशायाह इसे इस प्रकार से कहता है, ‘‘जब शत्रु महानद के समान चढ़ाई करेंगे तब यहोवा का आत्मा उसके विरूद्ध झण्डा खड़ा करेगा।'' (यशायाह 59:19ब)।
जब आप पवित्र भय से रो उठते हैं, तब परमेश्वर आपकी सुनता है और आपके सुरक्षा के लिये दौड़ के आता है। यह उसकी प्रतिज्ञा है, और वह कभी भी स्वयं के लिये अपनी प्रतिज्ञाओं को नहीं तोड़ता है।
परमेश्वर, मैंने जीवन में भय को जाना हैं, और बहुत बार मैंने भय पर ध्यान केन्द्रित किया है और यह भूल गई, कि यह आपको बुलाने का एक अवसर है। ताकि मैं अपने जीवन में आपके छुटकारे के हाथ को देख सकँ। मुझे पवित्र भय दे, ताकि मैं अपने समस्या के समय हमेशा आपको पुकारूँ। यीशु मसीह के नाम से यह मैं माँगती हूँ। आमीन।
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जीवन कभी-कभी हम में किसी को भी ध्यान ना देते समय पकड़ सकता है। जब आप के मन में युद्ध चलना आरम्भ होता है, दुश्मन परमेश्वर के साथ आपके संबंध को कमजोर करने के लिए उसके शस्त्रगार से प्रत्येक शस्त्र को इस्तेमाल करेगा। यह भक्तिमय संदेश आपको क्रोध, उलझन, दोष भावना, भय, शंका. .
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