भज़न 64
64
फाज़त करना लै बिधाता का अरज़
गाज़ै-बाज़ै आल़ेए सैणैं लै राज़ै दाबेदो भज़न
1हे परमेशर, मुंह पल़ी बेघै खरी, मेरी अरज़ शुण!
मुंह लागी मेरै दुशमणा का डअर, तूह बच़ाऊ ऐबै मेरी ज़िन्दगी!
2इना कबध खटणै आल़ी टोली का अर
इना कदुष्ट मणछे उपद्रभा का बच़ाऊ मुंह।
3तिंयां करा आपणीं ज़िभा तलबारा ज़ेही तिछी,
तिन्नें कल़ुऐ बोल च़ुभा ज़िहै कतीरा ज़िहै।
4तिंयां हेरा झ़ट च़ारै झ़ुठी गल्ला फणाऊंई,
झ़ुठी फुआह पाई करा तिंयां भलै मणछा बरैबाद।
5तिंयां दैआ एकी-दुजै लै बूरै करना लै शैह,
तिंयां रहा आप्पू मांझ़ै इना ई गल्ला करदै कि किधी ज़ेही डाहणीं फाही पाई।
तिंयां बोला इहअ, “हाम्हैं निं कोही लाऐ भाल़ी!”
6तिंयां सोठा बूरी बिक्री संघा बोला आप्पू मांझ़ै इहअ,
“अह सोठी बै हाम्हैं राम्बल़ी बिक्री,
कोही मणछा का निं थोघै कि हाम्हैं किज़ै सोठा।”
7पर हे परमेशर, ताह छ़ाडणैं आप्पै तिन्नां लै तिछै कतीर,
तिंयां बधल़णैं नभैऊशै धरनीं।
8ताह करनै तिंयां तिन्नें ई गल्ला करै बरैबाद,
होरी लोगा बी छ़ुटणअ तिन्नें हालत भाल़ी दर्छ़णअ।
9तेखअ पल़णीं सोभी मणछा डअर,
तेखअ सोठणअ तिन्नां कि बिधाता किज़ै आसा किअ द,
अर होरी का बी खोज़णअ तिन्नां कि बिधाता किज़ै काम आसा किअ द।
10ज़ुंण काम बिधाता किअ,
तेता करै हणीं सोभी धर्मीं मणछा खुशी।
तिन्नां भेटणीं तेऊ सेटा शरण,
भलै मणछा करनी तेऊए ज़ै-ज़ैकार।
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भज़न 64: OSJ
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