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भज़न 144:1
बाघली सराज़ी बोली दी पबित्र शास्त्र
OSJ
बिधाते ज़ै-ज़ैकार, ज़ुंण मुल्है शरण लणें बडी टोल्हा ज़िहअ आसा! सह शखैल़ा मुखा जुध-बिद्या अर जुध ज़ितणें कला।
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भज़न 144:15
सह देश भाल़ किहअ खुश हणअ ज़ेथ ईंयां सोभै गल्ला पूरी हणीं, तिन्नां मणछा लै आसा खास्सी बर्गत ज़ुंण बिधाता मना!
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भज़न 144:2
सह आसा मुल्है झींण अर मेरी फाज़त करनै आल़अ, सह आसा मुंह बच़ाऊंणै आल़अ अर मेरअ आसरअ, राज्ज़ी-राम्बल़अ आसा हुंह तेऊए ई भरोस्सै, सह दैआ देशा-देशे लोगा मेरै बशै करी।
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भज़न 144:3
हे बिधाता, मणछ किज़ै आसा कि तूह तिन्नां लै धैन दैए? तूह किल्है डाहा मणछो एतरअ धैन-खैल?
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