1 कुरिन्थियन 10

10
इजराइली लोगन के इतिहास से चेतउनी
1हे भाई-बहिनिव, हम इआ चाहित हएन, कि तूँ पंचे इआ बात जानिल्या, कि हमार पंचन के बाप-दादा बदरी के नीचे सुरच्छित रहत रहे हें, अउर ऊँ सगले जने लाल समुंद्र के बीचय-बीच चलिके पार होइगें;#निरग 13:21; 14:22-29 2अउर इआमेर से ऊँ पंचे सगले जने बदरी अउर समुंद्र के बपतिस्मा लइके मूसा नबी के सहभागी बनिगें। 3अउर सगले जने एकयमेर के आत्मिक खाना खाइन;#निरग 16:35 4अउर सगले जने एकयमेर के आत्मिक पानी पीन, काहेकि ऊँ पंचे उआ आत्मिक चट्टान से पानी पिअत रहे हें, जउन उनखे साथय-साथ चलत रही हय, अउर उआ चट्टान खुदय मसीह रहे हँय। 5पय उनमा से खुब जनेन से परमातिमा खुस नहीं रहे आहीं, एसे परमातिमा उनहीं जंगल माहीं मार डारिन।#गिन 14:29,30
6अउर ईं बातँय हमरे पंचन के खातिर उदाहरन साबित भई हँय, कि जइसन ऊँ पंचे लालच किहिन रहा हय, त हम पंचे उनखी कि नाईं बुरी चीजन के लालच न करी;#गिन 11:4 7अउर तूँ पंचे मूरतिन के पूजा करँइ बाले न बना, जइसन उनमा से कइअक जने मूरतिन के पूजा करँइ बाले बनिगे रहे हँय, जइसन कि पबित्र सास्त्र माहीं लिखा हय, कि “ऊँ पंचे खाँइ-पिअँइ के खातिर बइठें, अउर उराव मनामँइ के खातिर उठें।”#निरग 32:6 8अउर हम पंचे ब्यभिचार न करी; जइसन कि उनमा से कइअक जने किहिन रहा हय, अउर एकय दिन माहीं तेइस हजार मनई मरिगे रहे हँय।#गिन 25:1-18 9अउर न हम पंचे प्रभू के परिच्छा करी, जइसन कि उनमा से कइअक जने किहिन रहा हय, अउर साँपन के चाबँय के द्वारा मरिगे रहे हँय।#गिन 21:5,6 10अउर तूँ पंचे कुड़कुड़ाबव न करा, जइसन कि उनमा से कइअक जने कुड़कुड़ान रहे हँय, अउर नास करँइ बाले स्वरगदूत के द्वारा नास कइ दीनगे रहे हँय।#गिन 16:41-49 11पय ईं सगली बातँय जउन उनखे ऊपर बीती रही हँय; त ऊँ उदाहरन के रूप माहीं रही हँय, अउर ऊँ बातँय हमरे पंचन के चेतउनी के खातिर लिखी गई हँय, जउन इआ जुग के आखिरी समय माहीं रहित हएन। 12एसे जे कोऊ इआ समझत हय, कि हम बिसुआस माहीं मजबूत हएन, त उआ चउकस रहय, कि कहँव उआ बिसुआस से भटक न जाय। 13अउर तूँ पंचे कउनव अइसन परिच्छा माहीं नहीं परे आह्या, जउन कि मनई के सहँइ के सक्ती से जादा होत ही, काहेकि परमातिमा सच्चे हें, अउर ऊँ तोहईं पंचन काहीं सहँइ के सक्ती से जादा परिच्छा माहीं न परय देइहँय, पय अगर परिच्छा माहीं परिव जाते हया, त ओसे निकरँइ के घलाय उपाय करिहँय, जउने तूँ पंचे ओही सहि सका।
मूरतिन के पूजा करँइ से बँचे रहा
14इआ कारन से हे हमार पियार बिसुआसी भाई-बहिनिव, तूँ पंचे मूरतिन के पूजा करँइ से बँचे रहा 15हम तोहईं पंचन काहीं समझदार जानिके इआ कहित हएन, कि जउन बातँय हम तोंहसे कहित हएन, त उनहीं जाँचा-परखा, कि ऊँ सही हईं कि नहीं। 16अउर प्रभू-भोज माहीं भागीदार होंइ के समय अंगूर के जउने रस काहीं, हम पंचे परमातिमा काहीं धन्यबाद दइके पीत हएन, त मसीह के बलिदान के द्वारा जउन असीसँय हमहीं पंचन काहीं मिली हँय, उनमा हम पंचे भागीदार बन जइत हएन, उहयमेर जब हम पंचे रोटी टोरिके खइत हएन, त मसीह के द्वारा अपने देंह माहीं दुख सहँइ के द्वारा जउन असीसँय हमहीं मिली हँय, उन माहीं घलाय हम पंचे भागीदार बन जइत हएन। 17अउर हम पंचे एकयठे रोटी काहीं टोरिके खइत हएन, एसे कइअक जने होंइ के बादव, एकय देंह बन जइत हएन। 18अउर इजराइली लोगन काहीं देखा, कि जउन कुछू बेदी माहीं बलिदान कीन जात हय, ओही ऊँ पंचे खात हें, अउर ओमाहीं भागीदार बन जात हें। 19त पुनि हम इआ कहित हएन, कि न त मूरत के ऊपर चढ़ाई जाँय बाली चीज के कउनव महत्व आय, अउर न त मूरत के कउनव महत्व आय। 20अउर गैरयहूदी लोग जउन बलिदान करत हें, त ऊँ पंचे परमातिमा के खातिर न होय करत हें, बलकिन बुरी आत्मन के खातिर करत हें, त हम इआ चाहित हएन, कि तूँ पंचे बुरी आत्मन के भागीदार न बना। 21अउर तूँ पंचे प्रभू-भोज माहीं, प्रभू के मउत काहीं सुध करँइ केर खातिर अंगूर के रस पीते हया, अउर रोटी खाते हया, त पुनि तूँ पंचे बुरी आत्मन के खातिर चढ़ाए जाँइ बाले खाना काहीं, कइसा खाय सकते हया? तूँ पंचे प्रभू-भोज, अउर बुरी आत्मन के भोज, दोनव माहीं भाग नहीं लइ सकते आह्या। 22का हम पंचे अइसन कइके प्रभू काहीं क्रोधित करित हएन? का हम पंचे प्रभू से सक्तिसाली हएन?
सगले कामन के द्वारा परमातिमा के बड़ाई करा
23सगली चीजँय उचित त हईं, पय सगली चीजँय लाभदायक नहिं आहीं, अउर सगली चीजँय उचित त हईं, पय सगली चीजन से आत्मिक उन्नति नहीं होय। 24अउर हरेक मनई काहीं खुद के भलाई के बारे माहीं भर नहीं, बलकिन दुसरे मनइन के भलाई के बारे माहीं घलाय सोचँइ क चाही। 25अउर बजार माहीं जउन माँस बिकत हय, त ओही बिना संकोच के खाय सकते हया, पय ग्यान होंइ के कारन अपने मन माहीं इआ संका न करा, कि कहँव इआ मूरतिन के चढ़ाबा त न होय। 26काहेकि पबित्र सास्त्र माहीं इआ लिखा हय, कि “इआ धरती, अउर जउन कुछू एमाहीं हय, इआ सगला प्रभू के आय।” 27अउर अगर कउनव अबिसुआसी मनई तोंहार पंचन के नेउता करय, त अगर तूँ पंचे उहाँ जाँइ चहते हया, त जा, अउर जउन कुछू तोंहरे आँगे परसा जाय, त ओही खा; पय मन के सोच-बिचार के कारन बिना संकोच किहे खाय ल्या, अउर कउनव प्रस्न न पूँछा। 28पय अगर तोहईं पंचन काहीं कोऊ बताय देय, कि “इआ त मूरत के ऊपर चढ़ाबा खाना आय।” त उआ मनई के बताए के कारन अउर ओखे मन के सोच-बिचार के कारन ओही न खया। 29अउर तोंहार पंचन के सोच-बिचार इआ हय, कि हम पंचे सब कुछू खाय सकित हएन, पय हम तोंहरे सोच-बिचार के बारे माहीं न होय कहित हएन, पय दुसरे मनई के सोच-बिचार के बारे माहीं आय कहेन हँय, कि दूसर मनई अपने सोच-बिचार के द्वारा हमहीं पंचन काहीं दोसी न ठहराए पाबय, कि जउने चीज काहीं हम खइत हएन, त एही खाब उचित नहिं आय। 30अउर जउन कुछू हम पंचे खइत हएन, त परमातिमा काहीं धन्यबाद दइके खइत हएन, एसे जउने खाना काहीं हम परमातिमा काहीं धन्यबाद दइके खइत हएन, त ओही खाँय के कारन हमरे ऊपर दोस काहे लगाबा जात हय।
31एसे चाह तूँ पंचे खा-पिआ, अउर चाह जउन कुछू करा, पय ऊँ सगलेन के द्वारा परमातिमा के बड़ाई होंइ क चाही। 32अउर तूँ पंचे न त यहूदी लोगन के खातिर, न त गैरयहूदी लोगन के खातिर, अउर न परमातिमा के मन्डली के बिसुआसी लोगन के खातिर, बिसुआस से भटकामँइ के कारन बना। 33अउर जइसन हमहूँ घलाय, सगली बातन माहीं हरेक मनइन काहीं खुस करँइ के कोसिस करित हएन, अउर हम खुद के फायदय भर के इच्छा नहीं करी, बलकिन दुसरे मनइन के फायदा के खातिर घलाय कोसिस करित हएन, कि जउने ऊँ सगले जनेन काहीं घलाय मुक्ती मिलय।

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