राजदूतों पुस्तक की कुछ ज़रूरी बातें
पुस्तक की कुछ ज़रूरी बातें
लूकस प्रभु येशु के शिष्य थे जिन्होंने दो पुस्तकें लिखी हैं। पहली पुस्तक का नाम है, “मुक्तिदाता येशु का शुभ संदेश” जिसमें लूकस ने प्रभु येशु के जीवन, उपदेशों, अद्भुत चमत्कारों और उनकी दर्दनाक मृत्यु के बाद ज़िन्दा होने के बारे में लिखा है।
शिष्य लूकस की दूसरी पुस्तक जिसे हम यहाँ देख रहे हैं, उसका नाम है, “मुक्तिदाता येशु के राजदूतों के अद्भुत कार्य।” इसमें लूकस लिखते हैं कि कैसे अगले 30 सालों में प्रभु येशु के राजदूतों और शिष्यों ने परमात्मा की पवित्र आत्मा की शक्ति से भरकर उनके प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए अद्भुत तरीके से उनके संदेश को संसार में फैलाना शुरू किया।
पुस्तक के पहले पाँच अध्यायों में, प्रभु येशु के नज़दीकी शिष्य पतरस और योहन अपने गुरु के नाम का पुरे जोश से फैलाते हैं और लोगों को पवित्र आत्मा की शक्ति द्वारा स्वस्थ करते हैं। उस समय पतरस और योहन खासतौर पर यहूदी समाज में ही प्रभु येशु के शुभ संदेश के बारे में बताते थे।
बाद के तीन अध्यायों में, पवित्र आत्मा दो और शिष्यों, स्टैफनस और फिलिपस को प्रेरणा देती है कि वे प्रभु येशु के बारे में दूसरे समाज के लोगों में भी बताएँ।
बाकि अध्यायों में, शाऊल, जिसे पौलुस भी कहा जाता है, का वर्णन आता हैं। शुरू में पौलुस को लगता था कि प्रभु येशु का मार्ग पूरी तरह से गलत है और उसने प्रभु येशु के शिष्य को जेल में डलवा दिया यहाँ तक कि मरवा भी दिया। लेकिन एक दर्शन में प्रभु येशु के साथ उनका अद्भुत सामना होने के बाद, वह एक समर्पित शिष्य बन गए और अन्य नए शिष्यों के साथ कई सत्संगों की शुरुआत की।
बहुत मुश्किलों के साथ, राजदूतों और शिष्यों ने प्रभु येशु के शुभ संदेश को फैलाया और परमात्मा ने कई चमत्कारों को दिखा कर उनके संदेशों की पुष्टि की। कुछ सालों के भीतर ही अनेक अलग-अलग समाज के लोगों ने प्रभु येशु पर आस्था प्रकट की और उनके सत्संग पूरे रोम साम्राज्य में फैलते चले गए।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार भारत देश में भी प्रभु येशु के एक राजदूत थोमस द्वारा (सन् 52 सी.ई. में) यह अद्भुत संदेश भारत में फैलाया, लेकिन इस पुस्तक में थोमस का यह उल्लेख शामिल नहीं है।
इस पुस्तक की समाप्ति राजदूत पौलुस के रोम शहर की जेल में बंद होने से होती है। परंतु इससे संदेश रुका नहीं, दुनिया भर में लगातार फैलता चला गया।
अब हम भी जो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को बोलते हैं, परमात्मा की कृपा से प्रभु येशु के शिष्यों और राजदूतों के साथ मिलकर इस अद्भुत मार्ग का हिस्सा बन गए हैं।
प्रार्थना - “हे परमात्मा, शिष्य लूकस को मुक्तिदाता येशु के दूतों द्वारा किए गए अद्भुत कार्यों के बारे में लिखने की प्रेरणा देने के लिए आपका धन्यवाद। यह आपकी कृपा है कि हम भी आपकी पवित्र आत्मा प्राप्त कर सकते हैं, आपके सत्संग का हिस्सा बन सकते हैं और आपके शुभ संदेश को पूरी दुनिया में फैला सकते हैं।”
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