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गलातियों गलातियों के नाम प्रेरित पौलुस की पत्री

गलातियों के नाम प्रेरित पौलुस की पत्री
प्रेरित पौलुस निर्विवादित रूप से गलातियों के नाम लिखी इस पत्री का लेखक है (1:1, 5:2)। गलातिया एक रोमी प्रांत था, जहाँ पौलुस के प्रचार के फलस्वरूप कलीसियाओं की स्थापना हुई थी। इन कलीसियाओं में यहूदी और गैरयहूदी दोनों पृष्‍ठभूमि के विश्‍वासी थे। इन कलीसियाओं की स्थापना के बाद कुछ यहूदीवादी मसीही आकर भिन्‍न सुसमाचार का प्रचार करने लगे थे। उनकी शिक्षा मूसा की व्यवस्था के बंधनों पर केंद्रित थी, जो पौलुस के स्वतंत्रता के सुसमाचार से बिलकुल अलग थी। उनका मानना था कि परमेश्‍वर से सही संबंध बनाने के लिए व्यवस्था का पालन करना भी अनिवार्य है। उनकी इस गलत शिक्षा के कारण बहुत से लोग बहक गए थे, और इसलिए पौलुस ने इस पत्री को लिखा ताकि उन्हें सच्‍चे विश्‍वास में वापस ला सके। गलातियों की पत्री को “मसीही स्वतंत्रता का घोषणा पत्र” भी कहा जाता है। पौलुस गलातियों के विश्‍वासियों को यह कड़ा पत्र लिखता है ताकि वे कर्म पर आधारित झूठे सुसमाचार को दूर करें और विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने की श्रेष्‍ठता को प्रदर्शित करें।
पौलुस इस पत्री का आरंभ अपने प्रेरित होने के अधिकार के साथ करता है, जो उसे किसी मनुष्य की ओर से या किसी मनुष्य के द्वारा प्राप्‍त नहीं हुआ बल्कि यीशु मसीह और परमेश्‍वर पिता के द्वारा प्राप्‍त हुआ है। फिर वह विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने का तर्क देता है जिसे प्रमाणित करने के लिए वह अब्राहम, सारा और हाजिरा, तथा उनके दोनों पुत्रों का उदाहरण देता है। अंतिम अध्यायों में पौलुस बताता है कि पवित्र आत्मा के कार्य करने के द्वारा एक मसीही व्यक्‍ति न केवल व्यवस्था के दासत्व से बल्कि पाप के दासत्व से भी स्वतंत्र हो जाता है। स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि हम शरीर के कार्यों में लिप्‍त रहें, बल्कि यह हमारी अगुवाई करती है कि हम परमेश्‍वर पर निर्भर होकर अपने जीवन में आत्मा का फल लाएँ।
पौलुस इस पत्री की समाप्‍ति एक विरोधाभास के साथ करता है, जहाँ एक ओर यहूदीवादी मसीही हैं जो घमंड करते हैं और सताए जाने से बचते फिरते हैं; और दूसरी ओर पौलुस स्वयं है, जिसने सच्‍चे सुसमाचार के लिए दुःख उठाया और वह केवल मसीह में घमंड करता है।
रूपरेखा
1. भूमिका 1:1–10
2. प्रेरित के रूप में पौलुस का अधिकार 1:11—2:21
3. परमेश्‍वर के अनुग्रह का सुसमाचार 3:1—4:31
4. मसीही स्वतंत्रता और व्यवहार 5:1—6:10
5. उपसंहार 6:11–18

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