2 कुरिंथियों कुरिंथियों के नाम प्रेरित पौलुस की दूसरी पत्री
कुरिंथियों के नाम प्रेरित पौलुस की दूसरी पत्री
कुरिंथियों के नाम प्रेरित पौलुस की दूसरी पत्री में पौलुस उन गंभीर समस्याओं को संबोधित करता है जो उसकी पहली पत्री के बाद कुरिंथियों की कलीसिया में उत्पन्न हुई थीं।
कुरिंथियों की पहली पत्री के बाद सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा था। कलीसिया में कुछ झूठे शिक्षक घुस आए थे जिन्होंने लोगों को पौलुस के विरुद्ध भड़का दिया था। उनके अनुसार पौलुस का व्यक्तित्व बड़ा कमज़ोर, घमंडी और प्रभावहीन है तथा उसके प्रवचन व्यर्थ हैं; अतः वह प्रेरित होने के योग्य नहीं है। तब पौलुस ने अपनी वेदना और अप्रसन्नता को व्यक्त करते हुए तीतुस के हाथों कुरिंथियों की कलीसिया को एक पत्री भेजी (2:3–4; 7:8, 12)। जब तीतुस वापस लौटा तो पौलुस यह जानकर अति आनंदित हुआ कि कुरिंथियों की कलीसिया के अधिकाँश लोगों ने उस संदेश के प्रति सकारात्मक उत्तर देते हुए अपने किए पर पश्चात्ताप किया और पौलुस की प्रेरिताई को पुनः स्वीकार कर लिया था (7:6–9)। इस पत्री में पौलुस अपने आचरण, चरित्र और प्रेरित होने की अपनी बुलाहट का पक्ष रखता है।
इस पत्री के पहले भाग में पौलुस कुरिंथियों की कलीसिया को अपनी सेवकाई के विषय में समझाता है और पवित्र जीवन जीने का आह्वान करता है (अध्याय 1—7)। फिर वह कलीसिया से आग्रह करता है कि वे यरूशलेम के गरीब मसीहियों के लिये उदारतापूर्वक दान दें (अध्याय 8—9)। अंत के अध्यायों में पौलुस अपने प्रेरित होने के अधिकार को स्थापित करते हुए अपना पक्ष रखता है। पत्री का अंत प्रोत्साहन के शब्दों, अभिवादन और आशिष वचनों के साथ होता है।
पौलुस ने व्यक्तिगत बातों के बीच इस पत्री में कलीसिया के लिए कई प्रमुख धर्म-सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं, जैसे परमेश्वर का स्वभाव, उसका स्वरूप और उसके कार्य करने का ढंग (1:3–4; 2:14; 4:5–6; 5:18–21; 6:14–18; 9:7–15), नई और पुरानी वाचा के बीच अंतर (अध्याय 3), हमारा स्वर्गीय घर (5:1–10), परमेश्वर से मेल–मिलाप की सेवा (5:14–21), और धन के विषय में मसीही भंडारीपन (अध्याय 8—9)।
रूपरेखा
1. भूमिका 1:1–11
2. पौलुस और उसका सेवाकार्य 1:12—6:10
3. कुरिंथियों के विश्वासियों के लिए प्रोत्साहन 6:11—7:16
4. यरूशलेम के विश्वासियों के लिए दान 8:1—9:15
5.पौलुस द्वारा अपनी प्रेरिताई का पक्ष 10:1—13:10
6. उपसंहार 13:11–13
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