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भज़न 101

101
राज़अ अर तेऊए ज़बान
राज़ै दाबेदो भज़न
1हे बिधाता, मुंह गांठणी तेरी झींण अर नसाफे गिहा,
मुंह बोल़णीं तेरी ई गिहा।
2मुंह डाहणअ इहअ बभार ज़ेथ किछ़ै खोट निं होए,
ताह केभै एछणअ मुंह सेटा लै?
मुंह ज़िऊंणीं आपणैं घअरै शुची ज़िन्दगी।
3बूरी गल्‍ला निं हुंह मंदअ ई आथी।
भ्रष्ट कामां करनै आल़ै का करा हुंह नफरत,
इना इहै कदुष्ट मणछा संघै निं मुंह बभार ई डाहणअ।
4हुंह निं ताह नकदरै करदअ अर
नां बूराई संघै आपणअ नातअ डाहंदअ।
5इहै मणछा का रहणअ मुंह दूर
ज़ुंण होरीए घैंचल़ करा,
नां मुंह इहै मणछ मनणै ज़ुंण
शरेरै अर घमंडी होए।
6मुंह डाहणीं तिन्‍नां संघै संगत ज़ुंण बिधाता लै शुचै-पाक्‍कै होए,
तिन्‍नां दैणअ मुंह आपणीं ज़ैगा रहणैं।
आपणीं च़ाकरी करनै आल़ै बी डाहणैं मुंह तिंयां ई
ज़ुंण पठी मानदार होए।
7मुंह निं आपणीं ज़ैगा छ़ल़-कपट करनै आल़ै मणछा रहणैं दैणअ,
ज़ुंण झ़ुठअ बोला, सह निं मुंह सेटा टेक्‍की सकदअ।
8ज़ुंण मेरै देशै कदुष्ट होए,
तिंयां करनै मुंह धैल़ छ़ांटी करै बरैबाद करी,
बिधाते नगरी#101:8 नगरी एरुशलेम का करनै मुंह सोभै कदुष्ट खतम।

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