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स्तोत्र 100

100
स्तोत्र 100
एक स्तोत्र. धन्यवाद के लिए गीत.
1यहोवाह की स्तुति-आराधना में समस्त पृथ्वी उच्च स्वर में जयघोष करे.
2यहोवाह की आराधना आनंदपूर्वक की जाए;
हर्ष गीत गाते हुए उनकी उपस्थिति में प्रवेश किया जाए.
3यह समझ लीजिए कि स्वयं यहोवाह ही परमेश्वर हैं.
हमारी रचना उन्हीं ने की है, स्वयं हमने नहीं;
हम पर उन्हीं का स्वामित्व है.
हम उनकी प्रजा, उनकी चराई की भेड़ें हैं.
4धन्यवाद के भाव में उनके द्वारों में
और की स्तुति-आराधना के भाव में उनके आंगनों में प्रवेश करिये;
उनकी महिमा को धन्य कहिये.
5यहोवाह भले हैं; उनकी करुणा सदा की है;
उनकी सच्चाई का प्रसरण समस्त पीढ़ियों में होता जाता है.

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