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भज़न 71:5
बाघली सराज़ी बोली दी पबित्र शास्त्र
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हे मेरै मालक बिधाता, हुंह रहा ताह ई न्हैल़अ लागी, मंऐं आसा होछ़ी उझै ताह ई दी आशा डाही दी।
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भज़न 71:3
तूह बण मेरी शरण लणें ज़ैगा, अर मुंह आजू लुक्कणा लै बडी टोल्ह, मुंह बच़ाऊंणै आल़ी टोल्ह अर शरण लणें ज़ैगा आसा तूह ई।
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भज़न 71:14
हुंह डाहा सदा ताह ई प्रैंदै आशा, मुंह करनी तेरी ज़ै-ज़ैकार होर बी खास्सी।
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भज़न 71:1
हे बिधाता, हुंह लआ ताह सेटा शरण, मुंह निं शर्मिंदै हणैं दैई!
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भज़न 71:8
मुंह करनी सारी अमरा तेरी ई ज़ै-ज़ैकार अर तेरी महान शोभा खोज़णीं मुंह सोभी का।
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भज़न 71:15
मुंह खोज़णीं तेरी सोभ भलाई, मुंह रहणअ सारी धैल़ी गल्ला खोज़दै लागी कि तूह लोगा किहै बच़ाऊआ, ज़ात पठी गल्ला खोज़णीं आसा मेरी समझ़ा का बी बागै।
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