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भज़न 63:1
बाघली सराज़ी बोली दी पबित्र शास्त्र
OSJ
हे बिधाता, तूह आसा मेरअ परमेशर, मेरअ मन्न रहा ताह ई बाखा लागी, मेरी झ़ूरा सारी देही ताल्है ई, ज़ेही पाणीं बाझ़ी शुक्की ज़िम्मीं, तेही आसा मेरी आत्मां ताल्है नचिशी।
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भज़न 63:3
तेरी झींण आसा मुल्है मेरी ज़िन्दगी का बी पैरी, मुंह करनी तेरी ई बड़ैई।
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भज़न 63:4
मुंह रहणअ सारी अमरा तेरअ शूकर करदै लागी, मुंह फुआरनी अरज़ करना लै उझै ताह बाखा बाहा।
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भज़न 63:2
मंऐं भाल़ी तेरी पबित्र ज़ैगा तेरअ बल अर तेरअ महान धुप्पअ।
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भज़न 63:7-8
किल्हैकि तंऐं किई सदा मेरी मज़त, तेरै फैंखे छ़ैल्ली दी रही करनी मुंह तेरी खुशी-खुशी ज़ै-ज़ैकार। हुंह रहा ताह ई पिछ़ू ढाखुई, तूह डाहा मुंह आपणैं हाथै ढाकी राज्ज़ी-राम्बल़अ।
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भज़न 63:6
सुत्तणै का आजी करा हुंह ताह आद, सारी राची रहा हुंह तेरै बारै सोठदअ लागी।
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