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भज़न 61:1-2
बाघली सराज़ी बोली दी पबित्र शास्त्र
OSJ
हे परमेशर, मेरी पकार शुण, मंऐं किई ताह सेटा अरज़, तूह दै तेतो ज़बाब! मुखा निं ऐबै आशा ई शुझदी, हुंह मांगा ताखा आपणैं देशा का दूर रही लेर-पकार पाई मज़त। तूह बशैल़ मुंह तैहा बडी टोल्हा पिछ़ू ज़ेथ हुंह शरण लई सके।
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भज़न 61:3
मेरी शरण लणें ज़ैगा आसा तूह ई, मेरै दुशमणा का बच़णा लै उछ़टअ कोट बी आसा तूह ई।
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भज़न 61:4
मुंह दै आपणीं पबित्र ज़ैगा जुगै-जुगै तैणीं रहणैं, मुंह दै आपणैं फैंखा हेठै शरण लणैं।
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