ज़िधी बी हुंह गल्ला करा, मुंह लागा तेथ लैल़ा-पकारा अर ज़ोरै-ज़ोरै हाक्का पाणीं,
‘उपद्रभ हुअ! काट-मार हुई!’
हे बिधाता, हुंह हआ तेरै समादा खोज़णैं पिछ़ू
लोगे सुहांगा लै अर मुंह पल़ा धैल़ तेता पिछ़ू बेइज़त हणअ।
केभै सोठा हुंह इहअ, ‘ऐबै निं मुंह एते बारै लोगा का गल्ला करनीं ई आथी,
ऐबै निं मुंह तेरअ नाअं ई काढणअ!’
पर तेरअ समाद शोटा मुंह भितरा का दहई,
हुंह थका टवारअ करी-करी पर खिरी निं मेरै खोज़णैं बाझ़ी रहूंदअ ई आथी।