मत्तियाह 5
5
जीवनदायी उपदेश
लूकस 6:20-23
1जब गुरु येशु ने भीड़ को देखा तो वह पहाड़ी पर चढ़ गए और जब वह एक स्थान पर बैठ गए तब शिष्य उनके पास आए। 2वह उन्हें इस प्रकार शिक्षा देने लगे।
3“परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो गरीब हैं और उनके प्रति समर्पित हैं,
वे परमस्वर्ग के साम्राज्य में शामिल हैं।
4परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो पश्चाताप करते हैं,
उन्हें शांति प्राप्त होगी।
5परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो मन से कोमल हैं,
पृथ्वी उन्हीं की होगी।
6परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो हर एक काम परमात्मा की आज्ञाओं के अनुसार करते हैं।
वे संतुष्ट होंगे।
7परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो दूसरों पर दया दिखाते हैं,
उन पर भी दया दिखाई जाएगी।
8परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जिनके मन पवित्र हैं,
वे परमात्मा को देखेंगे।
9परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो मेल-मिलाप कराते हैं,
वे परमात्मा की संतान कहलाएँगे।
10परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो उनकी आज्ञाओं का पालन करने पर भी सताए जाते हैं,
वे परमस्वर्ग के साम्राज्य में शामिल होंगे।
11“परमात्मा तुम्हें आशीर्वाद देते हैं जब लोग मेरा शिष्य होने के कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम्हें सताते हैं, तुम्हारे खिलाफ झूठ बोलते है और तुम्हारे खिलाफ हर तरह की बुरी बातें बोलते हैं।
12“खुशी और आनंद मनाओ, क्योंकि तुम्हें परमात्मा परमस्वर्ग में बड़ा इनाम देंगे। इसी प्रकार लोगों ने परमात्मा के प्रवक्ताओं को भी सताया था जो तुमसे बहुत पहले आए थे।
नमक और दीपक से शिक्षा
मरकुस 9:49-50; 4:21; लूकस 14:34-35; 8:16; 11:33
13“तुम अच्छे नमक के समान हो, जिससे पृथ्वी के लोगों को लाभ होता है।#5:13 पृथ्वी के लोगों को लाभ होता है - अर्थात्, यह चीज़ों को शुद्ध करता है, जो अच्छा है उसे संरक्षित करता है, और रिश्तों को एक अच्छा स्वाद देता है। परंतु यदि नमक अपना स्वाद खो देता है, तो वह किसी काम का नहीं रहता, और लोग उसे बाहर फेंक देते हैं, और अपने पैरों तले रौंद देते हैं।
14“तुम सभी दुनिया के लिए एक रोशनी की तरह हो। तुम उस शहर की तरह हो जो पहाड़ पर बसा है जिसे दूर से साफ-साफ देखा जा सकता है। 15और तुम एक दीपक की तरह हो जो पूरे घर को रोशनी देता है। अपनी रोशनी को ढांप कर मत रखो। 16तुम्हारे अच्छे काम रोशनी की तरह चमकें ताकि लोग इन्हें देख सकें और इसके लिए वे तुम्हारे पिता परमात्मा#5:16 पिता परमात्मा - या, “पिता जो परमस्वर्ग में हैं।” इन शब्दों का अनुवाद निम्न स्थानों पर भी इसी प्रकार किया गया है (मत्तियाह 5:45,48; 6:1,9,14; 7:11,21; 10:32,3; 12:50, 16:17, 18:10,14,29) का गुणगान करें।
प्रभु येशु मोशे के नियमों के बारे में बात करते हैं
लूकस 16:17
17“यह न समझो कि मैं मोशे के नियम और शिक्षा और परमात्मा के प्रवक्ताओं की पुस्तकों को रद्द करने आया हूँ। मैं उन्हें रद्द करने नहीं, परंतु पूरा करने तथा उनका सही अर्थ प्रकट करने आया हूँ। 18मैं तुमसे सच कहता हूँ, जब तक आकाश और पृथ्वी रहेंगे, तब तक मोशे के नियम और शिक्षा की एक मात्रा या एक बिंदु भी रद्द नहीं होगी। मोशे के नियम और शिक्षा का लक्ष्य ज़रूर पूरा होगा।
19“इसलिए यदि कोई इन छोटी-से-छोटी आज्ञाओं में से एक को भी तोड़ता है और दूसरों को भी यही सिखाए, तो वह परमात्मा के परमस्वर्ग के साम्राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा। परंतु जो कोई उनका पालन करे और दूसरों को भी यही सिखाए, वह परमात्मा के सम्राज्य में महान कहलाएगा। 20मैं तुमसे कहता हूँ, तुम्हें धर्मगुरुओं और फरीसी धार्मिक पंथ के लोगों से बढ़कर परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करना होगा। नहीं तो तुम परमात्मा के परमस्वर्ग के साम्राज्य में नहीं जा सकते।
क्रोध और हत्या
लूकस 12:58
21“तुमने सुना है कि हमारे पूर्वजों से कहा गया था, ‘हत्या न करना और जो कोई हत्या करेगा वह दंड के योग्य होगा।’#निर्गमन 20:13-17 22किंतु मैं तुमसे कहता हूँ, जो कोई किसी पर#5:22 किसी पर - या, “अपने भाई से” गुस्सा करेगा, वह परमात्मा के सामने वह दंड के योग्य होगा। जो किसी का भी अपमान करेगा, उसको धर्म-महासभा के सामने न्याय के लिए पेश होना होगा। और जो कोई किसी को ‘अरे निकम्मे’ कहकर बुलाएगा वह आग से धधकते हुए नरक में डाले जाने के योग्य होगा।
23“यदि तुम अपनी भेंट मंदिर में चढ़ा रहे हो और वहाँ तुम्हें याद आए कि तुमसे कोई किसी कारण नाराज़ है, 24तो अपनी भेंट वेदी के सामने बिना चढ़ाए छोड़ दो और उस व्यक्ति के पास जाकर पहले नाराज़गी दूर करके मेल-मिलाप कर लो। और तब आकर भेंट चढ़ाओ।
25“जिसने तुमपर आरोप लगाया है जब वह तुम्हें अदालत ले जा रहा हो, अदालत पहुँचने से पहले ही उसे मनालो और समझोता कर लो। ऐसा न हो कि आरोप लगाने वाला तुम्हें जज को सौंप दे और जज सिपाही को जो तुम्हें जेल में डाल देगा। 26मैं तुमसे सच कहता हूँ, जब तक तुम एक-एक पैसा न चुका दोगे, तुम जेल से आज़ाद नहीं हो पाओगे।
दुराचार
मरकुस 9:43-48
27“तुमने सुना है कि यह कहा गया था, ‘शादी के बाहर शारीरिक सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए।’#निर्गमन 20:14 28किंतु मैं तुमसे कहता हूँ, जो कोई पुरुष किसी औरत को बुरी इच्छा से पाने की योजना बनाए तो वह मन में उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का पाप कर चुका है। 29यदि तुम्हारी दाईं आँख तुम्हें पाप में गिराने का कारण बने तो उसे निकालकर फेंक दो। हाँ, तुम एक आँख खो दोगे। लेकिन इससे बुरा यह होगा कि तुम्हारा पूरा शरीर सही सलामत रहे, परंतु परमात्मा तुम्हें उसे सही सलामत शरीर समेत नरक में फेंक दें। 30यदि तुम्हारा दायाँ हाथ तुमसे पाप करवाए तो उसे काटकर फेंक दो। हाँ, तुम एक हाथ खो दोगे। लेकिन इससे बुरा यह होगा कि तुम्हारा पूरा शरीर सही सलामत रहे परंतु परमात्मा तुम्हें उसे सही सलामत शरीर समेत नरक में फेंक दें।
तलाक देने का सिर्फ एक कारण
मत्तियाह 19:9; मरकुस 10:11-12; लूकस 16:18
31“तुमने सुना है कि यह भी कहा गया था, ‘जो पति अपनी पत्नी को तलाक दे, वह उसे रिश्ता खत्म होने का कानूनी कागज़ दे।’#उपदेश 24:1 32लेकिन अब मैं तुमसे कहता हूँ, अगर कोई पति अपनी पत्नी के किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध रखने के अलावा किसी और कारण से तलाक दे और अगर वह स्त्री किसी और से शादी करती है, तो पहला पति उससे यौन पाप कराता है। और अगर कोई दूसरा पुरुष उस तलाकशुदा महिला से शादी करता है, तो वह भी यौन पाप करता है।
शपथ और सच्चाई
33“तुमने सुना है कि हमारे पूर्वजों से कहा गया था, ‘झूठी कसम न खाना, परंतु प्रभु परमात्मा के लिए अपनी मन्नतों को ज़रूर पूरा करना।’#लेवी 19:12; जनगणना 30:2 34-35लेकिन जो मैं तुमको बताना चाहता हूँ, वह यह है कि अपनी बात को विश्वासयोग्य बनाने के लिए किसी के नाम की कसम न खाना। न तो ‘परमस्वर्ग’ या ‘पृथ्वी’ के नामों का इस्तेमाल करना क्योंकि परमस्वर्ग और पृथ्वी वे स्थान हैं जहाँ परमात्मा शासन करते हैं। किसी कसम को विश्वासयोग्य बनाने के लिए ‘यरूशलम’ नाम का इस्तेमाल न करना क्योंकि यरूशलम महान राजा परमात्मा का शहर है जो वहाँ भी शासन करते हैं। 36किसी कसम को विश्वासयोग्य बनाने के लिए ‘तुम्हारे सिर की कसम’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करना, क्योंकि तुम अपने एक भी बाल के असली रंग को स्थाई रूप से बदल नहीं सकते।
37“इसके बजाय, जब तुम किसी से कुछ कहते हो, तो तुमको केवल यह कहना चाहिए ‘हाँ, मैं यह करूँगा।’ या तुमको केवल यह कहना चाहिए ‘नहीं, मैं यह नहीं करूंगा।’ इससे अधिक कुछ भी कहोगे तो जो कहोगे वह ठीक नहीं है और तुम कहीं न कहीं शैतान के प्रभाव में हो।
बदला लेने की सोचो भी मत
लूकस 6:29,30
38“तुमने सुना है कि यह कहा गया था, ‘अगर तुम्हारी आंख पर कोई चोट लगाए, तो तुम भी उसकी आंख पर चोट करो। और अगर तुम्हारे दांत पर कोई चोट लगाए, तो तुम भी उसके दांत पर चोट करो।’#निर्गमन 21:24; लेवी 24:20 39किंतु मैं तुमसे कहता हूँ, दुश्मन से बदला लेने की सोचो भी मत, परंतु जो तुम्हारे दाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी उसकी ओर कर दो। 40जो तुम पर मुकद्दमा करके तुमसे कुछ लेना चाहे, तो उसे उसकी माँग से अधिक दे दो। 41यदि कोई अपना भारी सामान उठाकर तुम्हें एक किलोमीटर लेकर चलने को मजबूर करे, तो खुशी-खुशी उसके साथ दो किलोमीटर चले जाओ।#5:41 दो किलोमीटर - रोम सैनिक को यह अधिकार था कि वह किसी व्यक्ति को अपना सामान को एक किलोमीटर तक ले जाने के लिए मजबूर कर सकता था। 42जो तुमसे कुछ माँगे उसे दो और जो तुमसे उधार लेना चाहे उससे मुँह न मोड़ो।
दोस्तों और शत्रुओं से प्रेम करना
लूकस 6:27-28,32-36
43“तुमने सुना है कि यह कहा गया था, ‘अपने दोस्तों से प्रेम करना#लेवी 19:18,33 और अपने शत्रु से नफरत।’ 44पर मैं तुमसे कहता हूँ, अपने दोस्तों के साथ-साथ अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो। तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार करने वालों के लिए प्रार्थना करो कि परमात्मा उनका भला करें। 45इस तरह, तुम दिखा सको कि तुम पिता परमात्मा की संतान हो, क्योंकि परमात्मा अच्छे और बुरे दोनों लोगों पर समान रूप से सूर्य उदय करते हैं तथा धर्मी और अधर्मी दोनों पर बारिश बरसाते हैं। 46यदि तुम केवल उन्हीं से प्रेम करो जो तुमसे प्रेम करते हैं तो इसमें क्या बड़ी बात है? क्या बेईमान व्यापारी#5:46 बेईमान व्यापारी - या, “टैक्स लेने वाले।” इस समय के सबसे बेईमान व्यापारियों में से थे। यह नहीं करते? 47यदि तुम केवल अपने समाज के लोगों को ही नमस्कार करते हो तो इसमें भी क्या बड़ी बात है? क्या दूसरे समाज के लोग ऐसा नहीं करते? 48इसलिए तुम हर तरह से अच्छे बनो, क्योंकि तुम्हारे पिता परमात्मा हर तरह से अच्छे हैं।”
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जीवनदायी उपदेश
लूकस 6:20-23
1जब गुरु येशु ने भीड़ को देखा तो वह पहाड़ी पर चढ़ गए और जब वह एक स्थान पर बैठ गए तब शिष्य उनके पास आए। 2वह उन्हें इस प्रकार शिक्षा देने लगे।
3“परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो गरीब हैं और उनके प्रति समर्पित हैं,
वे परमस्वर्ग के साम्राज्य में शामिल हैं।
4परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो पश्चाताप करते हैं,
उन्हें शांति प्राप्त होगी।
5परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो मन से कोमल हैं,
पृथ्वी उन्हीं की होगी।
6परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो हर एक काम परमात्मा की आज्ञाओं के अनुसार करते हैं।
वे संतुष्ट होंगे।
7परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो दूसरों पर दया दिखाते हैं,
उन पर भी दया दिखाई जाएगी।
8परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जिनके मन पवित्र हैं,
वे परमात्मा को देखेंगे।
9परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो मेल-मिलाप कराते हैं,
वे परमात्मा की संतान कहलाएँगे।
10परमात्मा उन लोगों को आशीर्वाद देते हैं
जो उनकी आज्ञाओं का पालन करने पर भी सताए जाते हैं,
वे परमस्वर्ग के साम्राज्य में शामिल होंगे।
11“परमात्मा तुम्हें आशीर्वाद देते हैं जब लोग मेरा शिष्य होने के कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम्हें सताते हैं, तुम्हारे खिलाफ झूठ बोलते है और तुम्हारे खिलाफ हर तरह की बुरी बातें बोलते हैं।
12“खुशी और आनंद मनाओ, क्योंकि तुम्हें परमात्मा परमस्वर्ग में बड़ा इनाम देंगे। इसी प्रकार लोगों ने परमात्मा के प्रवक्ताओं को भी सताया था जो तुमसे बहुत पहले आए थे।
नमक और दीपक से शिक्षा
मरकुस 9:49-50; 4:21; लूकस 14:34-35; 8:16; 11:33
13“तुम अच्छे नमक के समान हो, जिससे पृथ्वी के लोगों को लाभ होता है।#5:13 पृथ्वी के लोगों को लाभ होता है - अर्थात्, यह चीज़ों को शुद्ध करता है, जो अच्छा है उसे संरक्षित करता है, और रिश्तों को एक अच्छा स्वाद देता है। परंतु यदि नमक अपना स्वाद खो देता है, तो वह किसी काम का नहीं रहता, और लोग उसे बाहर फेंक देते हैं, और अपने पैरों तले रौंद देते हैं।
14“तुम सभी दुनिया के लिए एक रोशनी की तरह हो। तुम उस शहर की तरह हो जो पहाड़ पर बसा है जिसे दूर से साफ-साफ देखा जा सकता है। 15और तुम एक दीपक की तरह हो जो पूरे घर को रोशनी देता है। अपनी रोशनी को ढांप कर मत रखो। 16तुम्हारे अच्छे काम रोशनी की तरह चमकें ताकि लोग इन्हें देख सकें और इसके लिए वे तुम्हारे पिता परमात्मा#5:16 पिता परमात्मा - या, “पिता जो परमस्वर्ग में हैं।” इन शब्दों का अनुवाद निम्न स्थानों पर भी इसी प्रकार किया गया है (मत्तियाह 5:45,48; 6:1,9,14; 7:11,21; 10:32,3; 12:50, 16:17, 18:10,14,29) का गुणगान करें।
प्रभु येशु मोशे के नियमों के बारे में बात करते हैं
लूकस 16:17
17“यह न समझो कि मैं मोशे के नियम और शिक्षा और परमात्मा के प्रवक्ताओं की पुस्तकों को रद्द करने आया हूँ। मैं उन्हें रद्द करने नहीं, परंतु पूरा करने तथा उनका सही अर्थ प्रकट करने आया हूँ। 18मैं तुमसे सच कहता हूँ, जब तक आकाश और पृथ्वी रहेंगे, तब तक मोशे के नियम और शिक्षा की एक मात्रा या एक बिंदु भी रद्द नहीं होगी। मोशे के नियम और शिक्षा का लक्ष्य ज़रूर पूरा होगा।
19“इसलिए यदि कोई इन छोटी-से-छोटी आज्ञाओं में से एक को भी तोड़ता है और दूसरों को भी यही सिखाए, तो वह परमात्मा के परमस्वर्ग के साम्राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा। परंतु जो कोई उनका पालन करे और दूसरों को भी यही सिखाए, वह परमात्मा के सम्राज्य में महान कहलाएगा। 20मैं तुमसे कहता हूँ, तुम्हें धर्मगुरुओं और फरीसी धार्मिक पंथ के लोगों से बढ़कर परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करना होगा। नहीं तो तुम परमात्मा के परमस्वर्ग के साम्राज्य में नहीं जा सकते।
क्रोध और हत्या
लूकस 12:58
21“तुमने सुना है कि हमारे पूर्वजों से कहा गया था, ‘हत्या न करना और जो कोई हत्या करेगा वह दंड के योग्य होगा।’#निर्गमन 20:13-17 22किंतु मैं तुमसे कहता हूँ, जो कोई किसी पर#5:22 किसी पर - या, “अपने भाई से” गुस्सा करेगा, वह परमात्मा के सामने वह दंड के योग्य होगा। जो किसी का भी अपमान करेगा, उसको धर्म-महासभा के सामने न्याय के लिए पेश होना होगा। और जो कोई किसी को ‘अरे निकम्मे’ कहकर बुलाएगा वह आग से धधकते हुए नरक में डाले जाने के योग्य होगा।
23“यदि तुम अपनी भेंट मंदिर में चढ़ा रहे हो और वहाँ तुम्हें याद आए कि तुमसे कोई किसी कारण नाराज़ है, 24तो अपनी भेंट वेदी के सामने बिना चढ़ाए छोड़ दो और उस व्यक्ति के पास जाकर पहले नाराज़गी दूर करके मेल-मिलाप कर लो। और तब आकर भेंट चढ़ाओ।
25“जिसने तुमपर आरोप लगाया है जब वह तुम्हें अदालत ले जा रहा हो, अदालत पहुँचने से पहले ही उसे मनालो और समझोता कर लो। ऐसा न हो कि आरोप लगाने वाला तुम्हें जज को सौंप दे और जज सिपाही को जो तुम्हें जेल में डाल देगा। 26मैं तुमसे सच कहता हूँ, जब तक तुम एक-एक पैसा न चुका दोगे, तुम जेल से आज़ाद नहीं हो पाओगे।
दुराचार
मरकुस 9:43-48
27“तुमने सुना है कि यह कहा गया था, ‘शादी के बाहर शारीरिक सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए।’#निर्गमन 20:14 28किंतु मैं तुमसे कहता हूँ, जो कोई पुरुष किसी औरत को बुरी इच्छा से पाने की योजना बनाए तो वह मन में उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का पाप कर चुका है। 29यदि तुम्हारी दाईं आँख तुम्हें पाप में गिराने का कारण बने तो उसे निकालकर फेंक दो। हाँ, तुम एक आँख खो दोगे। लेकिन इससे बुरा यह होगा कि तुम्हारा पूरा शरीर सही सलामत रहे, परंतु परमात्मा तुम्हें उसे सही सलामत शरीर समेत नरक में फेंक दें। 30यदि तुम्हारा दायाँ हाथ तुमसे पाप करवाए तो उसे काटकर फेंक दो। हाँ, तुम एक हाथ खो दोगे। लेकिन इससे बुरा यह होगा कि तुम्हारा पूरा शरीर सही सलामत रहे परंतु परमात्मा तुम्हें उसे सही सलामत शरीर समेत नरक में फेंक दें।
तलाक देने का सिर्फ एक कारण
मत्तियाह 19:9; मरकुस 10:11-12; लूकस 16:18
31“तुमने सुना है कि यह भी कहा गया था, ‘जो पति अपनी पत्नी को तलाक दे, वह उसे रिश्ता खत्म होने का कानूनी कागज़ दे।’#उपदेश 24:1 32लेकिन अब मैं तुमसे कहता हूँ, अगर कोई पति अपनी पत्नी के किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध रखने के अलावा किसी और कारण से तलाक दे और अगर वह स्त्री किसी और से शादी करती है, तो पहला पति उससे यौन पाप कराता है। और अगर कोई दूसरा पुरुष उस तलाकशुदा महिला से शादी करता है, तो वह भी यौन पाप करता है।
शपथ और सच्चाई
33“तुमने सुना है कि हमारे पूर्वजों से कहा गया था, ‘झूठी कसम न खाना, परंतु प्रभु परमात्मा के लिए अपनी मन्नतों को ज़रूर पूरा करना।’#लेवी 19:12; जनगणना 30:2 34-35लेकिन जो मैं तुमको बताना चाहता हूँ, वह यह है कि अपनी बात को विश्वासयोग्य बनाने के लिए किसी के नाम की कसम न खाना। न तो ‘परमस्वर्ग’ या ‘पृथ्वी’ के नामों का इस्तेमाल करना क्योंकि परमस्वर्ग और पृथ्वी वे स्थान हैं जहाँ परमात्मा शासन करते हैं। किसी कसम को विश्वासयोग्य बनाने के लिए ‘यरूशलम’ नाम का इस्तेमाल न करना क्योंकि यरूशलम महान राजा परमात्मा का शहर है जो वहाँ भी शासन करते हैं। 36किसी कसम को विश्वासयोग्य बनाने के लिए ‘तुम्हारे सिर की कसम’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करना, क्योंकि तुम अपने एक भी बाल के असली रंग को स्थाई रूप से बदल नहीं सकते।
37“इसके बजाय, जब तुम किसी से कुछ कहते हो, तो तुमको केवल यह कहना चाहिए ‘हाँ, मैं यह करूँगा।’ या तुमको केवल यह कहना चाहिए ‘नहीं, मैं यह नहीं करूंगा।’ इससे अधिक कुछ भी कहोगे तो जो कहोगे वह ठीक नहीं है और तुम कहीं न कहीं शैतान के प्रभाव में हो।
बदला लेने की सोचो भी मत
लूकस 6:29,30
38“तुमने सुना है कि यह कहा गया था, ‘अगर तुम्हारी आंख पर कोई चोट लगाए, तो तुम भी उसकी आंख पर चोट करो। और अगर तुम्हारे दांत पर कोई चोट लगाए, तो तुम भी उसके दांत पर चोट करो।’#निर्गमन 21:24; लेवी 24:20 39किंतु मैं तुमसे कहता हूँ, दुश्मन से बदला लेने की सोचो भी मत, परंतु जो तुम्हारे दाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी उसकी ओर कर दो। 40जो तुम पर मुकद्दमा करके तुमसे कुछ लेना चाहे, तो उसे उसकी माँग से अधिक दे दो। 41यदि कोई अपना भारी सामान उठाकर तुम्हें एक किलोमीटर लेकर चलने को मजबूर करे, तो खुशी-खुशी उसके साथ दो किलोमीटर चले जाओ।#5:41 दो किलोमीटर - रोम सैनिक को यह अधिकार था कि वह किसी व्यक्ति को अपना सामान को एक किलोमीटर तक ले जाने के लिए मजबूर कर सकता था। 42जो तुमसे कुछ माँगे उसे दो और जो तुमसे उधार लेना चाहे उससे मुँह न मोड़ो।
दोस्तों और शत्रुओं से प्रेम करना
लूकस 6:27-28,32-36
43“तुमने सुना है कि यह कहा गया था, ‘अपने दोस्तों से प्रेम करना#लेवी 19:18,33 और अपने शत्रु से नफरत।’ 44पर मैं तुमसे कहता हूँ, अपने दोस्तों के साथ-साथ अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो। तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार करने वालों के लिए प्रार्थना करो कि परमात्मा उनका भला करें। 45इस तरह, तुम दिखा सको कि तुम पिता परमात्मा की संतान हो, क्योंकि परमात्मा अच्छे और बुरे दोनों लोगों पर समान रूप से सूर्य उदय करते हैं तथा धर्मी और अधर्मी दोनों पर बारिश बरसाते हैं। 46यदि तुम केवल उन्हीं से प्रेम करो जो तुमसे प्रेम करते हैं तो इसमें क्या बड़ी बात है? क्या बेईमान व्यापारी#5:46 बेईमान व्यापारी - या, “टैक्स लेने वाले।” इस समय के सबसे बेईमान व्यापारियों में से थे। यह नहीं करते? 47यदि तुम केवल अपने समाज के लोगों को ही नमस्कार करते हो तो इसमें भी क्या बड़ी बात है? क्या दूसरे समाज के लोग ऐसा नहीं करते? 48इसलिए तुम हर तरह से अच्छे बनो, क्योंकि तुम्हारे पिता परमात्मा हर तरह से अच्छे हैं।”
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