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1 कुरिन्थियों 10:19-33

1 कुरिन्थियों 10:19-33 HINOVBSI

फिर मैं क्या कहता हूँ? क्या यह कि मूर्ति पर चढ़ाया गया बलिदान कुछ है, या मूर्ति कुछ है? नहीं, वरन् यह कि अन्यजाति जो बलिदान करते हैं; वे परमेश्‍वर के लिये नहीं परन्तु दुष्‍टात्माओं के लिये बलिदान करते हैं और मैं नहीं चाहता कि तुम दुष्‍टात्माओं के सहभागी हो। तुम प्रभु के कटोरे और दुष्‍टात्माओं के कटोरे दोनों में से नहीं पी सकते। तुम प्रभु की मेज और दुष्‍टात्माओं की मेज दोनों के साझी नहीं हो सकते। क्या हम प्रभु को क्रोध दिलाते हैं? क्या हम उस से शक्‍तिमान हैं? सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित तो हैं, परन्तु सब लाभ की नहीं : सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित तो हैं, परन्तु सब वस्तुओं से उन्नति नहीं। कोई अपनी ही भलाई को नहीं, वरन् दूसरों की भलाई को ढूँढ़े। जो कुछ कस्साइयों के यहाँ बिकता है, वह खाओ और विवेक के कारण कुछ न पूछो? “क्योंकि पृथ्वी और उस की भरपूरी प्रभु की है।” यदि अविश्‍वासियों में से कोई तुम्हें नेवता दे, और तुम जाना चाहो, तो जो कुछ तुम्हारे सामने रखा जाए वही खाओ; और विवेक के कारण कुछ न पूछो। परन्तु यदि कोई तुम से कहे, “यह तो मूर्ति को बलि की हुई वस्तु है,” तो उसी बतानेवाले के कारण और विवेक के कारण न खाओ। मेरा मतलब तेरा विवेक नहीं, परन्तु उस दूसरे का। भला, मेरी स्वतंत्रता दूसरे के विचार से क्यों परखी जाए? यदि मैं धन्यवाद करके साझी होता हूँ, तो जिस पर मैं धन्यवाद करता हूँ उसके कारण मेरी बदनामी क्यों होती है? इसलिये तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्‍वर की महिमा के लिये करो। तुम न यहूदियों, न यूनानियों, और न परमेश्‍वर की कलीसिया के लिये ठोकर के कारण बनो। जैसा मैं भी सब बातों में सब को प्रसन्न रखता हूँ, और अपना नहीं परन्तु बहुतों का लाभ ढूँढ़ता हूँ कि वे उद्धार पाएँ।

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