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ग़ज़लुल-ग़ज़लात 4:7
किताब-ए मुक़द्दस
DGV
मेरी महबूबा, तेरा हुस्न कामिल है, तुझमें कोई नुक़्स नहीं है।
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ग़ज़लुल-ग़ज़लात 4:9
मेरी बहन, मेरी दुलहन, तूने मेरा दिल चुरा लिया है, अपनी आँखों की एक ही नज़र से, अपने गुलूबंद के एक ही जौहर से तूने मेरा दिल चुरा लिया है।
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