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ज़बूर 119:105
किताब-ए मुक़द्दस
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तेरा कलाम मेरे पाँवों के लिए चराग़ है जो मेरी राह को रौशन करता है।
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ज़बूर 119:11
मैंने तेरा कलाम अपने दिल में महफ़ूज़ रखा है ताकि तेरा गुनाह न करूँ।
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ज़बूर 119:9
नौजवान अपनी राह को किस तरह पाक रखे? इस तरह कि तेरे कलाम के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारे।
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ज़बूर 119:2
मुबारक हैं वह जो उसके अहकाम पर अमल करते और पूरे दिल से उसके तालिब रहते हैं
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ज़बूर 119:114
तू मेरी पनाहगाह और मेरी ढाल है, मैं तेरे कलाम के इंतज़ार में रहता हूँ।
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ज़बूर 119:34
मुझे समझ अता कर ताकि तेरी शरीअत के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारूँ और पूरे दिल से उसके ताबे रहूँ।
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ज़बूर 119:36
मेरे दिल को लालच में आने न दे बल्कि उसे अपने फ़रमानों की तरफ़ मायल कर।
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ज़बूर 119:71
मेरे लिए अच्छा था कि मुझे पस्त किया गया, क्योंकि इस तरह मैंने तेरे अहकाम सीख लिए।
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ज़बूर 119:50
मुसीबत में यही तसल्ली का बाइस रहा है कि तेरा कलाम मेरी जान को ताज़ादम करता है।
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ज़बूर 119:35
अपने अहकाम की राह पर मेरी राहनुमाई कर, क्योंकि यही मैं पसंद करता हूँ।
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ज़बूर 119:33
ऐ रब, मुझे अपने आईन की राह सिखा तो मैं उम्र-भर उन पर अमल करूँगा।
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ज़बूर 119:28
मेरी जान दुख के मारे निढाल हो गई है। मुझे अपने कलाम के मुताबिक़ तक़वियत दे।
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ज़बूर 119:97
तेरी शरीअत मुझे कितनी प्यारी है! दिन-भर मैं उसमें महवे-ख़याल रहता हूँ।
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