क्योंकि जब भी मैं अपना मुँह खोलता हूँ तो मुझे चिल्लाकर ‘ज़ुल्मो-तबाही’ का नारा लगाना पड़ता है। चुनाँचे मैं रब के कलाम के बाइस पूरा दिन गालियों और मज़ाक़ का निशाना बना रहता हूँ। लेकिन अगर मैं कहूँ, “आइंदा मैं न रब का ज़िक्र करूँगा, न उसका नाम लेकर बोलूँगा” तो फिर उसका कलाम आग की तरह मेरे दिल में भड़कने लगता है। और यह आग मेरी हड्डियों में बंद रहती और कभी नहीं निकलती। मैं इसे बरदाश्त करते करते थक गया हूँ, यह मेरे बस की बात नहीं रही।