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भज़न 118:24
बाघली सराज़ी बोली दी पबित्र शास्त्र
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ऐहा धैल़ी आसा बिधाते ज़ीत हुई दी, अह धैल़ी मनाऊंणी हाम्हां खुशी।
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भज़न 118:6
बिधाता आसा मुंह बाखा आप्पै, तैही निं हुंह डरदअ आथी। संसारे मणछ निं मेरअ किछ़ै बगाल़ी सकदै।
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भज़न 118:8
मणछे आसरै रहणैं का आसा बिधाता सेटा शरण लणी भली।
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भज़न 118:5
मंऐं पाई खरीए पलका बिधाता सेटा पकार, तेऊ शूणीं मेरी अरज़ संघा किअ हुंह आज़ाद।
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भज़न 118:29
बिधातो शूकर करा, किल्हैकि सह आसा भलअ अर सह झ़ूरा हाम्हां लै सदा।
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भज़न 118:1
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भज़न 118:14
बिधाता दैआ आप्पै मुल्है ज़ोर अर बल, तेऊ बच़ाऊअ हुंह आप्पै।
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भज़न 118:9
बलबान प्रधाने आसरै रहणैं का आसा बिधाता सेटा शरण लणी भली।
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भज़न 118:22
ज़ुंण पात्थर मिस्त्री बृथा समझ़अ त, तंऐं बणाअं सह ई पात्थर सोभी का खास।
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