यौ प्रिय भाइ लोकनि, हम अहाँ सभ सँ आग्रह करैत छी जे अहाँ सभ अपना केँ एहि संसार मे परदेशी आ यात्री बुझि कऽ मनुष्य-स्वभावक पापमय इच्छा सभ केँ अपना सँ दूर राखू। ओ इच्छा सभ अहाँ सभक आत्माक विरोध मे युद्ध करैत अछि। अविश्वासी सभक बीच अपन चालि-चलन केँ एतेक नीक बना कऽ राखू जे, जे सभ एखन अहाँ सभ केँ अधलाह काज करऽ वला कहि कऽ निन्दा करैत अछि, से सभ अहाँ सभक नीक काज सभ देखि कऽ न्यायक दिन मे परमेश्वरक स्तुति करनि।