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रोमियों 9:16
किताब-ए मुक़द्दस
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चुनाँचे सब कुछ अल्लाह के रहम पर ही मबनी है। इसमें इनसान की मरज़ी या कोशिश का कोई दख़ल नहीं।
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रोमियों 9:15
क्योंकि उसने मूसा से कहा, “मैं जिस पर मेहरबान होना चाहूँ उस पर मेहरबान होता हूँ और जिस पर रहम करना चाहूँ उस पर रहम करता हूँ।”
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रोमियों 9:20
यह न कहें। आप इनसान होते हुए कौन हैं कि अल्लाह के साथ बहस-मुबाहसा करें? क्या जिसको तश्कील दिया गया है वह तश्कील देनेवाले से कहता है, “तूने मुझे इस तरह क्यों बना दिया?”
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रोमियों 9:18
ग़रज़, यह अल्लाह ही की मरज़ी है कि वह किस पर रहम करे और किस को सख़्त कर दे।
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रोमियों 9:21
क्या कुम्हार का हक़ नहीं है कि गारे के एक ही लौंदे से मुख़्तलिफ़ क़िस्म के बरतन बनाए, कुछ बाइज़्ज़त इस्तेमाल के लिए और कुछ ज़िल्लतआमेज़ इस्तेमाल के लिए?
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