मत्तियाह 26

26
येशु की हत्या का षड़्‍यंत्र
1इस रहस्य के खुलने के बाद येशु ने शिष्यों को देखकर कहा, 2“यह तो आप लोगों को मालूम ही है कि दो दिन बाद फ़सह#26:2 फ़सह यहूदियों का सबसे बड़ा त्योहार जब मिस्र में उनकी 430 साल की ग़ुलामी से उनके छुटकारे को वे स्मरण करते हैं. उत्सव है. इस समय मानव-पुत्र को क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए सौंप दिया जाएगा.”
3दूसरी ओर प्रधान पुरोहित और वरिष्ठ नागरिक कायाफ़स नामक महापुरोहित के घर के आंगन में इकट्ठा हुए. 4उन्होंने मिलकर येशु को छलपूर्वक पकड़कर उनकी हत्या कर देने का विचार किया. 5वे यह विचार भी कर रहे थे: “यह फ़सह उत्सव के अवसर पर न किया जाए—कहीं इससे लोगों में बलवा न भड़क उठे.”
बैथनियाह नगर में येशु का अभ्यंजन
6जब येशु बैथनियाह गांव में शिमओन के घर पर थे—वही शिमओन, जिन्हें पहले कोढ़ रोग हुआ था, 7एक स्त्री उनके पास संगमरमर के बर्तन में कीमती इत्र लेकर आई. उस इत्र को उन्होंने भोजन के लिए बैठे येशु के सिर पर उंडेल दिया.
8यह देख शिष्य क्रोधित हो गए, और उन्होंने पूछा, “यह बर्बादी क्यों? 9यह इत्र तो ऊंचे दाम पर बिक सकता था और प्राप्‍त धनराशि गरीबों में बांटी जा सकती थी.”
10इस विषय को जानकर येशु ने उन्हें झिड़कते हुए कहा, “आप लोग इन स्त्री को क्यों सता रहे हैं? इन्होंने तो मेरे हित में एक सराहनीय काम किया है. 11निर्धन आप लोगों के साथ हमेशा रहेंगे किंतु मैं आप लोगों के साथ हमेशा नहीं रहूंगा. 12मुझे मेरे अंतिम संस्कार के लिए तैयार करने के लिए इन्होंने यह इत्र मेरे शरीर पर उंडेला है. 13सच तो यह है कि सारे जगत में जहां कहीं यह सुसमाचार प्रचार किया जाएगा, इन स्त्री के इस कार्य का वर्णन भी इसकी याद में किया जाएगा.”
यहूदाह का धोखा
14तब कारियोतवासी यहूदाह, जो बारह शिष्यों में से एक थे, प्रधान पुरोहितों के पास गए 15और उनसे विचार-विमर्श करने लगे, “यदि मैं येशु को पकड़वा दूं तो आप मुझे क्या देंगे?” उन्होंने उन्हें गिन कर चांदी के तीस सिक्‍के दे दिए. 16उस समय से यहूदाह येशु को पकड़वाने के लिए सही अवसर की ताक में रहने लगे.
फ़सह भोज की तैयारी
17अखमीरी रोटी के उत्सव#26:17 अखमीरी रोटी के उत्सव यह उत्सव सात दिनों तक चलता है. (निसान महीना ता: 15–22), फ़सह पर्व से शुरू होकर सात दिनों के दौरान यहूदी लोग बिना खमीर की रोटी खाते हैं. के पहले दिन शिष्यों ने येशु के पास आकर पूछा, “हम आपके लिए फ़सह भोज की तैयारी कहां करें? आप क्या चाहते हैं?”
18येशु ने उन्हें निर्देश दिया, “नगर में एक व्यक्ति विशेष के पास जाइए और उनसे कहिये, ‘गुरुवर ने कहा है, मेरा समय पास है. मुझे अपने शिष्यों के साथ आपके घर में फ़सह उत्सव मनाना है.’ ” 19शिष्यों ने वैसा ही किया, जैसा येशु ने निर्देश दिया था और उन्होंने फ़सह भोज तैयार किया.
20संध्या समय येशु अपने बारह शिष्यों के साथ बैठे हुए थे. 21जब वे भोजन कर रहे थे तब येशु ने उनसे कहा, “मैं आप लोगों पर एक सच प्रकट कर रहा हूं: आप लोगों में ही एक हैं, जो मेरे साथ धोखा करेंगे.”
22बहुत उदास मन से हर एक शिष्य येशु से पूछने लगे, “प्रभु, वह मैं तो नहीं हूं?”
23येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “जिन्होंने मेरे साथ कटोरे में अपना कौर डुबोया था, वही हैं, जो मेरे साथ धोखा करेंगे. 24मानव-पुत्र को तो जैसा कि उनके विषय में पवित्रशास्त्र में लिखा है, जाना ही है; किंतु धिक्कार है उन व्यक्ति पर, जो मानव-पुत्र के साथ धोखा करेंगे. उन व्यक्ति के लिए अच्छा तो यही होता कि उनका जन्म ही न होता.”
25यहूदाह ने, जो येशु के साथ धोखा कर रहे थे, उनसे प्रश्न किया, “रब्बी, वह मैं तो नहीं हूं न?”#26:25 अथवा, यह तुमने स्वयं कह दिया.
येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “यह आपने स्वयं ही कह दिया है.”
26जब वे भोजन के लिए बैठे, येशु ने रोटी ली, उसके लिए आशीष विनती की, उसे तोड़ी और शिष्यों को देते हुए कहा, “यह लीजिए, खाइए; यह मेरा शरीर है.”
27तब येशु ने प्याला लिया, उसके लिए धन्यवाद दिया तथा शिष्यों को देते हुए कहा, “आप सब इसमें से पीजिये. 28यह वाचा का#26:28 कुछ हस्तलेखों में नई वाचा का. मेरा लहू है जो अनेकों की पाप क्षमा के लिए उंडेला जा रहा है. 29मैं यह बताना चाहता हूं कि मैं दाख का रस उस दिन तक नहीं पिऊंगा जब तक मैं अपने पिता के राज्य में आप लोगों के साथ दाखरस दोबारा नहीं पिऊं.”
30एक भक्ति गीत गाने के बाद वे ज़ैतून पर्वत पर चले गए.
शिष्यों की भावी निर्बलता की भविष्यवाणी
31येशु ने शिष्यों से कहा, “आज रात आप सभी मेरा साथ छोड़कर चले जाएंगे, जैसा कि इस संबंध में पवित्रशास्त्र का लेख है:
“ ‘मैं चरवाहे का संहार करूंगा और,
झुंड की सभी भेड़ें तितर-बितर हो जाएंगी.’#26:31 ज़कर 13:7
32हां, पुनर्जीवित किए जाने के बाद मैं आप लोगों से पहले गलील प्रदेश पहुंच जाऊंगा.”
33किंतु पेतरॉस ने येशु से कहा, “सभी शिष्य आपका साथ छोड़कर जाएं तो जाएं किंतु मैं आपका साथ कभी न छोड़ूंगा.”
34येशु ने उनसे कहा, “सच्चाई तो यह है कि आज ही रात में, इसके पहले कि मुर्ग बांग दे, आप मुझे तीन बार नकार चुके होंगे.”
35पेतरॉस ने दोबारा उनसे कहा, “मुझे आपके साथ यदि मृत्यु को भी गले लगाना पड़े तो भी मैं आपको नहीं नकारूंगा.” अन्य सभी शिष्यों ने भी यही दोहराया.
गेतसेमनी बगीचे में येशु की अवर्णनीय वेदना
36तब येशु उनके साथ गेतसेमनी नामक स्थान पर पहुंचे. उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “आप लोग यहीं बैठिए जब तक मैं वहां जाकर प्रार्थना करता हूं.” 37फिर वह पेतरॉस और ज़ेबेदियॉस के दोनों पुत्रों को अपने साथ ले आगे चले गए. वहां येशु अत्यंत उदास और व्याकुल होने लगे. 38उन्होंने शिष्यों से कहा, “मेरे प्राण इतने अधिक उदास हैं, मानो मेरी मृत्यु हो रही हो. मेरे साथ आप लोग भी जागते रहिये.”
39तब येशु उनसे थोड़ी ही दूर जा मुख के बल गिरकर प्रार्थना करने लगे. उन्होंने परमेश्वर से निवेदन किया, “मेरे पिता, यदि संभव हो तो यह प्याला मुझसे टल जाए; फिर भी मेरी नहीं परंतु आपकी इच्छा के अनुरूप हो.”
40जब वह अपने शिष्यों के पास लौटे तो उन्हें सोया हुआ देख उन्होंने पेतरॉस से कहा, “अच्छा, आप लोग मेरे साथ एक घंटा भी सजग न रह सके! 41सजग रहिये, प्रार्थना करते रहिये, ऐसा न हो कि आप परीक्षा में पड़ जाएं. हां, निःसंदेह आत्मा तो तैयार है किंतु शरीर दुर्बल.”
42तब येशु ने दूसरी बार जाकर प्रार्थना की, “मेरे पिता, यदि यह प्याला मेरे पिए बिना मुझसे टल नहीं सकता तो आप ही की इच्छा पूरी हो.”
43वह दोबारा लौटकर आए तो देखा कि शिष्य सोए हुए हैं—क्योंकि उनकी पलकें बोझिल थीं. 44एक बार फिर वह उन्हें छोड़ आगे चले गए और तीसरी बार प्रार्थना की और उन्होंने प्रार्थना में वही सब दोहराया.
45तब वह शिष्यों के पास लौटे और उनसे कहा, “क्या आप लोग अभी भी सो रहे और आराम कर रहे हैं? बहुत हो गया! देखिये! आ गया है वह क्षण! मानव-पुत्र पापियों के हाथों पकड़वाए जा रहे हैं. 46उठिए! यहां से चलें. देखिये, जो मुझे पकड़वाने पर हैं, वह आ गए!”
येशु का बंदी बनाया जाना
47येशु अपना कथन समाप्‍त भी न कर पाए थे कि यहूदाह, जो बारह शिष्यों में से एक थे, वहां आ पहुंचे. उनके साथ एक बड़ी भीड़ थी, जो तलवारें और लाठियां लिए हुए थी. ये सब प्रधान पुरोहितों और यहूदी नेतागण की ओर से भेजे गए थे. 48येशु के विश्वासघाती ने उन्हें यह संकेत दिया था: “मैं जिन्हें चूमूं, वही होंगे वह. उन्हें ही पकड़ लीजिएगा.” 49वहां पहुंचते ही यहूदाह सीधे येशु के पास गए और उनसे कहा, “प्रणाम, रब्बी!” और उन्हें चूम लिया.
50येशु ने यहूदाह से कहा,
“मेरे मित्र, जिस काम के लिए आप आए हैं, उसे पूरा कर लीजिए.” उन्होंने आकर येशु को पकड़ लिया. 51येशु के शिष्यों में से एक ने तलवार खींची और महापुरोहित के दास पर चला दी जिससे उन दास का कान कट गया.
52येशु ने उन शिष्य से कहा, “अपनी तलवार को म्यान में रखिये! जो तलवार उठाते हैं, वे तलवार से ही नाश किए जाएंगे. 53क्या आप यह तो नहीं सोच रहे कि मैं अपने पिता से विनती नहीं कर सकता और वह मेरे लिए स्वर्गदूतों के बारह या उससे अधिक लेगिओन#26:53 अर्थात्, बड़ी सेना नहीं भेज सकते? 54फिर भला पवित्रशास्त्र के लेख कैसे पूरे होंगे, जिनमें लिखा है कि यह सब इसी प्रकार होना अवश्य है?”
55तब येशु ने भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, “क्या मुझे पकड़ने के लिए आप लोगों को तलवारें और लाठियां लेकर आने की ज़रूरत थी, जैसे किन्हीं डाकू को पकड़ने के लिए होती है? मैं तो प्रतिदिन मंदिर में बैठकर शिक्षा दिया करता था! तब आप लोगों ने मुझे नहीं पकड़ा! 56यह सब इसलिये हुआ है कि भविष्यद्वक्ताओं के लेख पूरे हों.” तब सभी शिष्य उन्हें छोड़कर भाग गए.
येशु महासभा के सामने
57जिन्होंने येशु को पकड़ा था वे उन्हें महापुरोहित कायाफ़स के यहां ले गए, जहां व्यवस्था-विधि के शिक्षक तथा यहूदी नेतागण इकट्ठा थे. 58पेतरॉस कुछ दूरी पर येशु के पीछे-पीछे चलते हुए महापुरोहित के आंगन में आ पहुंचे और वहां वह प्रहरियों के साथ बैठ गए कि देखें आगे क्या-क्या होता है.
59येशु को मृत्यु दंड देने की इच्छा लिए हुए प्रधान पुरोहित तथा पूरी महासभा येशु के विरुद्ध झूठे गवाह खोजने का यत्न कर रही थी, 60किंतु इसमें वे विफल ही रहे. यद्यपि अनेक झूठे गवाह सामने आए, किंतु मृत्यु दंड के लिए आवश्यक दो सहमत गवाह उन्हें फिर भी न मिले.
आखिर दो गवाह सामने आए 61जिन्होंने कहा, “यह व्यक्ति कहते थे, ‘मैं परमेश्वर के मंदिर को नाश करके उसे तीन दिन में दोबारा खड़ा करने में समर्थ हूं.’ ”
62तब महापुरोहित ने खड़े होकर येशु से पूछा, “क्या आपको अपने बचाव में कुछ नहीं कहना है? ये सब लोग आपके विरुद्ध क्या-क्या गवाही दे रहे हैं!” 63येशु मौन ही रहे.
तब महापुरोहित ने येशु से कहा, “मैं आपको जीवित परमेश्वर की शपथ देता हूं कि आप हमें बताइए, क्या आप ही मसीह, परमेश्वर के पुत्र हैं?”
64येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “आपने यह स्वयं कह दिया है, फिर भी, मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि इसके बाद आप मानव-पुत्र को सर्वशक्तिमान की दायीं ओर बैठे तथा आकाश के बादलों पर आता हुआ देखेंगे.”#26:64 स्तोत्र 110:1; दानि 7:13
65यह सुनना था कि महापुरोहित ने अपने वस्त्र फाड़ डाले और कहा, “परमेश्वर-निंदा की है उन्होंने! क्या अब भी गवाहों की ज़रूरत है? आप सभी ने स्वयं यह परमेश्वर-निंदा सुनी है. 66अब क्या विचार है आपका?”
समस्त परिषद ने उत्तर दिया, “वह मृत्यु दंड के योग्य हैं.”
67तब उन्होंने येशु के मुख पर थूका, उन पर घूंसों से प्रहार किया, कुछ ने उन्हें थप्पड़ भी मारे और फिर उनसे प्रश्न किया, 68“मसीह! भविष्यवाणी कीजिए, कि आपको किसने मारा है?”
पेतरॉस का नकारना
69पेतरॉस आंगन में बैठे हुए थे. एक दासी वहां से निकलीं और पेतरॉस से पूछने लगीं, “आप भी तो उन गलीलवासी येशु के साथ थे न?”
70किंतु पेतरॉस ने सबके सामने यह कहते हुए इस सच को नकार दिया: “क्या कह रही हैं आप? मैं समझा नहीं!”
71जब पेतरॉस द्वार से बाहर निकले, तो एक दूसरी दासी ने पेतरॉस को देख वहां उपस्थित लोगों से कहा, “यह व्यक्ति नाज़रेथ के येशु के साथ थे.”
72एक बार फिर पेतरॉस ने शपथ खाकर नकारते हुए कहा, “मैं उन व्यक्ति को नहीं जानता.”
73कुछ समय बाद एक व्यक्ति ने पेतरॉस के पास आकर कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं कि आप भी उनमें से एक हैं. आपकी भाषा-शैली से यह स्पष्ट हो रहा है.”
74पेतरॉस अपशब्द कहते हुए शपथ खाकर कहने लगे, “मैं उन व्यक्ति को नहीं जानता!”
उनका यह कहना था कि मुर्ग ने बांग दी. 75पेतरॉस को येशु की वह कही हुई बात याद आई, “इसके पहले कि मुर्ग बांग दे आप मुझे तीन बार नकार चुके होंगे.” पेतरॉस बाहर गए और फूट-फूटकर रोने लगे.

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मत्तियाह 26: HCV

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