रोमियों रोमियों के नाम प्रेरित पौलुस की पत्री

रोमियों के नाम प्रेरित पौलुस की पत्री
रोमियों के नाम इस पत्री का लेखक पौलुस है (1:1)। यद्यपि रोमियों की कलीसिया पौलुस द्वारा स्थापित नहीं की गई थी, फिर भी उसकी प्रबल इच्छा थी कि वह वहाँ जाकर विश्‍वासियों को दृढ़ करे। उसने कई बार वहाँ जाने की योजना बनाई, पर उसके मार्ग में बाधाएँ आईं जिसके कारण वह जा नहीं पाया (1:11–13)। तब उसने तीसरी प्रचार यात्रा के दौरान यह पत्री लिखी और संभवतः किंख्रिया की फीबे नामक स्‍त्री के द्वारा यह पत्री उन तक पहुँचाई (16:1,2)। इसमें बाइबल के धर्म-सिद्धांतों की सबसे क्रमबद्ध प्रस्तुति है।
पौलुस आरंभ में ही मुख्य विषय की घोषणा कर देता है : परमेश्‍वर के सुसमाचार में परमेश्‍वर की धार्मिकता प्रकट होती है जो विश्‍वास से है और विश्‍वास के लिए है (1:16–17)। पत्री से हमें यह ज्ञात होता है कि रोमियों की कलीसिया में गैरयहूदी विश्‍वासियों की संख्या अधिक थी (1:13, 11:13, 28–31; 15:15–16), परंतु साथ ही साथ वहाँ यहूदी पृष्‍ठभूमि के विश्‍वासी भी थे (2:17—3:8; 3:21—4:1; 7:1–14; 14:1—15:12)।
रोमियों की पत्री में पौलुस प्रारंभिक कलीसिया के कुछ चिंताजनक विषयों को संबोधित करता है। कलीसिया में गैरयहूदी विश्‍वासियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही थी, जिससे ये प्रश्‍न भी उठ रहे थे कि यहूदियों के साथ उनका क्या संबंध होगा? क्या गैरयहूदियों को यीशु का अनुयायी बनने के लिए पहले यहूदी बनना पड़ेगा? यदि नहीं तो यीशु पर विश्‍वास करनेवाले गैरयहूदियों के लिए पुराने नियम का क्या महत्व होगा? यदि गैरयहूदी यीशु के शिष्य बन जाते हैं तो उस वाचा का क्या अर्थ रह जाता है जो परमेश्‍वर ने सदा के लिए यहूदियों से बाँधी थी?
पौलुस बताता है कि सब मनुष्यों ने पाप किया है, और वे परमेश्‍वर की महिमा से रहित हैं, इस कारण विश्‍वास से धर्मी ठहराए जाने की ज़रूरत है (1:16—4:25)। इसके बाद पौलुस विश्‍वास से धर्मी ठहराए जाने के परिणाम को वर्तमान के अनुभव और भविष्य की आशा के रूप में प्रस्तुत करता है (5:1—8:39)। तब पौलुस इस विषय पर अपना खेद प्रकट करता है कि उसके बहुत से संगी यहूदियों ने सुसमाचार को ग्रहण नहीं किया है और वह इस पर धर्मवैज्ञानिक तर्क देता है (अध्याय 9—11)। फिर अंत में वह वर्णन करता है कि कैसे सुसमाचार अपने माननेवालों के दिन प्रतिदिन के जीवन को प्रभावित करता है (अध्याय 12—16)। पौलुस पत्री का समापन व्यक्‍तिगत अभिवादन और परमेश्‍वर की स्तुति के साथ करता है।
रूपरेखा
1. भूमिका 1:1–17
2. मनुष्य की पापमय अवस्था और उद्धार की आवश्यकता 1:18—3:20
3. धर्मी ठहराए जाने के लिए परमेश्‍वर का मार्ग 3:21—5:21
4. मसीह में नया जीवन 6:1—8:39
5. परमेश्‍वर की योजना में इस्राएल 9:1—11:36
6. मसीही आचरण 12:1—15:13
7. उपसंहार और व्यक्‍तिगत अभिवादन 15:14—16:27

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