मत्तियाह 27:1-31
मत्तियाह 27:1-31 HCV
प्रातःकाल सभी प्रधान पुरोहितों तथा यहूदी नेतागण ने आपस में येशु को मृत्यु दंड देने की सहमति की. येशु को बेड़ियों से बांधकर वे उन्हें राज्यपाल पिलातॉस के यहां ले गए. इसी समय, जब येशु पर दंड की आज्ञा सुनाई गई, यहूदाह, जिन्होंने येशु के साथ धोखा किया था, दुःख और पश्चाताप से भर उठे. उन्होंने प्रधान पुरोहितों और यहूदी नेतागण के पास जाकर चांदी के वे तीस सिक्के यह कहते हुए लौटा दिए, “एक निर्दोष के साथ धोखा करके मैंने पाप किया है.” “हमें इससे क्या?” वे बोले, “यह आपकी समस्या है!” उन सिक्कों को मंदिर में फेंककर यहूदाह चले गए और जाकर फांसी लगा ली. उन सिक्कों को इकट्ठा करते हुए प्रधान पुरोहितों ने विचार किया, “इस राशि को मंदिर के कोष में डालना उचित नहीं है क्योंकि यह लहू का दाम है.” तब उन्होंने इस विषय में विचार-विमर्श कर उस राशि से परदेशियों के अंतिम संस्कार के लिए कुम्हार का एक खेत मोल लिया. यही कारण है कि आज तक उस खेत को “लहू का खेत” नाम से जाना जाता है. इससे भविष्यवक्ता येरेमियाह द्वारा की गई यह भविष्यवाणी पूरी हो गई: “उन्होंने चांदी के तीस सिक्के लिए—यह उसका दाम है, जिसका दाम इस्राएल वंश के द्वारा निर्धारित किया गया था और उन्होंने वे सिक्के कुम्हार के खेत के लिए दे दिए, जैसा निर्देश प्रभु ने मुझे दिया था.” येशु राज्यपाल के सामने लाए गए और राज्यपाल ने उनसे प्रश्न करने प्रारंभ किए, “क्या आप यहूदियों के राजा हैं?” येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “यह आप स्वयं ही कह रहे हैं.” जब येशु पर प्रधान पुरोहितों और यहूदी नेतागण द्वारा आरोप पर आरोप लगाए जा रहे थे, येशु मौन बने रहे. इस पर पिलातॉस ने येशु से कहा, “क्या आप सुन नहीं रहे ये लोग आप पर कितने आरोप लगा रहे हैं?” येशु ने पिलातॉस को किसी भी आरोप का कोई उत्तर न दिया. राज्यपाल के लिए यह अत्यंत आश्चर्यजनक था. उत्सव पर परंपरा के अनुसार राज्यपाल की ओर से उन एक बंदी को, जिन्हें लोग चाहते थे, छोड़ दिया जाता था. उस समय बंदीगृह में बार-अब्बास नामक एक कुख्यात अपराधी बंदी थे. इसलिये जब लोग इकट्ठा हुए पिलातॉस ने उनसे प्रश्न किया, “मैं आप लोगों के लिए किन्हें छोड़ दूं, बार-अब्बास को या येशु को, जो मसीह कहलाते हैं? क्या चाहते हैं आप लोग?” पिलातॉस को यह मालूम हो चुका था कि मात्र जलन के कारण ही उन्होंने येशु को उनके हाथों में सौंपा था. जब पिलातॉस न्यायासन पर बैठे थे, तब उनकी पत्नी ने उन्हें यह संदेश भेजा, “उन धर्मी व्यक्ति को कुछ मत करिए क्योंकि पिछली रात मुझे स्वप्न में उनके कारण घोर पीड़ा हुई है.” इस पर प्रधान पुरोहितों और यहूदी नेतागण ने भीड़ को उकसाया कि वे बार-अब्बास के छुटकारे और येशु के मृत्यु दंड की मांग करें. राज्यपाल ने उनसे पूछा, “आप लोग क्या चाहते हैं, दोनों में से मैं किसे छोड़ दूं?” भीड़ का उत्तर था: “बार-अब्बास को.” इस पर पिलातॉस ने उनसे पूछा, “तब मैं येशु का, जो मसीह कहलाते हैं, क्या करूं?” उन सभी ने एक साथ कहा, “उन्हें क्रूस पर चढ़ाया जाए!” पिलातॉस ने पूछा, “क्यों? क्या अपराध है उनका?” किंतु वे और अधिक चिल्लाने लगे, “क्रूस पर चढ़ाया जाए उन्हें!” जब पिलातॉस ने देखा कि वह कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं परंतु हुल्लड़ की संभावना है तो उन्होंने भीड़ के सामने अपने हाथ धोते हुए यह घोषणा कर दी, “मैं इस व्यक्ति के लहू का दोषी नहीं हूं. आप लोग ही इस बात के लिए उत्तरदायी हैं.” लोगों ने उत्तर दिया, “इनके लहू का दोष हम पर तथा हमारी संतानों पर हो!” तब पिलातॉस ने उनके लिए बार-अब्बास को मुक्त कर दिया किंतु येशु को कोड़े लगवाकर क्रूसित करने के लिए भीड़ के हाथों में सौंप दिया. तब पिलातॉस के सैनिक येशु को प्राइतोरियम अर्थात् किले के भीतर, महल के आंगन में ले गए और वहां उन्होंने सारी रोमी सैनिक टुकड़ी इकट्ठी कर ली. जो वस्त्र येशु पहने हुए थे, उसे उतारकर उन्होंने उन्हें एक चमकीला लाल वस्त्र पहना दिया. उन्होंने एक कंटीली लता को गूंधकर उसका मुकुट बना उनके सिर पर रख दिया और उनके दायें हाथ में नरकुल की एक छड़ी थमा दी. तब वे उनके सामने घुटने टेककर यह कहते हुए उनका मज़ाक करने लगे, “यहूदियों के राजा की जय!” उन्होंने येशु पर थूका भी और फिर उनके हाथ से उस नरकुल छड़ी को लेकर उसी से उनके सिर पर प्रहार करने लगे. इस प्रकार जब वे येशु का उपहास कर चुके, तब उन्होंने वह लाल वस्त्र उतारकर उन्हीं के वस्त्र उन्हें पहना दिए और उन्हें उस स्थल पर ले जाने लगे जहां उन्हें क्रूस पर चढ़ाया जाना था.


