मत्तियाह 22:1-33

मत्तियाह 22:1-33 HCV

येशु फिर से उन्हें दृष्‍टांतों में शिक्षा देने लगे. उन्होंने कहा, “स्वर्ग-राज्य की तुलना एक राजा से की जा सकती है, जिन्होंने अपने पुत्र के विवाह के उपलक्ष्य में एक भोज का आयोजन किया. राजा ने अपने सेवकों को आमंत्रित अतिथियों को बुला लाने के लिए भेजा किंतु उन्होंने आना न चाहा. “राजा ने अन्य सेवकों को यह कहकर भेजा, ‘आमंत्रित अतिथियों से कहिये, “मैंने अपने भोज की सारी तैयारी कर ली है. घर में पले हुए पशुओं के तथा अच्छे अच्छे व्यंजन बनाए जा चुके हैं. सब कुछ तैयार है, भोज में पधारिए.” ’ “किंतु आमंत्रितों ने इस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया परंतु वे सब अपने कामों में लगे रहे—एक अपने खेत में, दूसरा अपने व्यापार में; शेष ने उन सेवकों को पकड़कर उनके साथ गलत व्यवहार किया और फिर उनकी हत्या कर डाली. गुस्से में आकर राजा ने वहां अपनी सेना भेज दी कि वह उन हत्यारों का नाश करे और उनके नगर को भस्म कर दे. “तब राजा ने अपने सेवकों को आज्ञा दी, ‘विवाह-भोज तो तैयार है किंतु जिन्हें आमंत्रित किया गया था, वे इसके योग्य न थे; इसलिये अब आप लोग मुख्य-मुख्य चौकों पर चले जाइए और वहां आप लोगों को जितने भी व्यक्ति मिलें, उन्हें विवाह-भोज में आमंत्रित करिये.’ उन सेवकों ने जाकर रास्ते पर जितने व्यक्ति मिले, उन्हें इकट्ठा कर लिया—योग्य-अयोग्य सभी को, जिससे विवाहोत्सव का भोजनकक्ष आमंत्रितों से भर गया. “जब राजा उस कक्ष में उनसे भेंट करने आए, तो उन्होंने वहां एक ऐसे व्यक्ति को देखा, जिन्होंने विवाहोत्सव के लिए उपयुक्त वस्त्र नहीं पहने थे. राजा ने उनसे प्रश्न किया, ‘मित्र, विवाहोत्सव के लिए सही वस्त्र पहने बिना आप यहां कैसे आ गए?’ उनके पास इसका कोई उत्तर न था. “तब राजा ने सेवकों को आज्ञा दी, ‘इनके हाथ-पांव बांधकर बाहर अंधकार में फेंक दीजिए, जहां बहुत रोना और दांत पीसना होता रहेगा.’ “बुलाए हुए तो बहुत हैं, किंतु चुने हुए थोड़े.” तब फ़रीसियों ने जाकर येशु को उन्हीं के शब्दों में फंसाने की योजना की. उन्होंने अपने कुछ शिष्यों को कुछ हेरोदेस समर्थकों के साथ यह प्रश्न पूछने भेजा: “गुरुवर, हमें यह तो मालूम है कि आप सच्चे हैं, तथा परमेश्वर के राज्य की शिक्षा पूरी सच्चाई में ही देते हैं. आप में कहीं कोई भेद-भाव नहीं है, और आप किसी मनुष्य के प्रभाव में नहीं आते. इसलिये हमें बताइए कि आपके विचार से कयसर को कर भुगतान करना उचित है या नहीं?” येशु को उनकी कुटिलता का अहसास हो गया. येशु ने कहा, “अरे पाखंडियो! आप लोग मुझे परखने का प्रयास कर रहे हैं! कर के लिए निर्धारित मुद्रा मुझे दिखाइए.” उन्होंने येशु को दीनार की एक मुद्रा दिखाई. येशु ने उनसे कहा, “इस पर यह आकृति तथा मुद्रण किसका है?” “कयसर का,” उन्होंने उत्तर दिया. इस पर येशु ने उनसे कहा, “तो फिर जो कयसर का है, कयसर को दो और जो परमेश्वर का है, परमेश्वर को.” इस पर वे चकित होकर येशु को छोड़कर वहां से चले गए. उसी समय सदूकी संप्रदाय के कुछ लोग, जिनकी यह मान्यता है कि पुनरुत्थान जैसी कोई बात ही नहीं होती, येशु के पास आए और उनसे प्रश्न करने लगे, “गुरुवर, मोशेह की शिक्षा है: यदि कोई पुरुष निःसंतान हो और उनकी मृत्यु हो जाए तो उनका भाई उनकी पत्नी से विवाह करके अपने भाई के लिए संतान पैदा करें. इसी विषय में एक घटना इस प्रकार है: एक परिवार में सात भाई थे. पहले का विवाह हुआ किंतु उनकी मृत्यु हो गई. इसलिये कि वह निःसंतान थे वह अपनी पत्नी को अपने भाई के लिए छोड़ गए. ऐसा ही दूसरे, तीसरे भाई से लेकर सातवें भाई तक होता रहा. अंत में उन स्त्री की भी मृत्यु हो गई. अब यह बताइए कि पुनरुत्थान पर वह किनकी पत्नी कहलाएंगी? क्योंकि उनका विवाह तो उन सबके साथ हुआ था.” येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “आप लोग बड़ी भूल कर रहे हैं: आप लोगों ने न तो पवित्रशास्त्र के लेखों को समझा है और न ही परमेश्वर की सामर्थ्य को. पुनरुत्थान में न तो लोग वैवाहिक अवस्था में होंगे और न ही वहां उनके विवाह होंगे. वहां तो वे सभी स्वर्ग के दूतों के समान होंगे. मरे हुओं के जी उठने के विषय में क्या आपने पढ़ा नहीं कि परमेश्वर ने आपसे यह कहा था: ‘मैं ही अब्राहाम का परमेश्वर, यित्सहाक का परमेश्वर तथा याकोब का परमेश्वर हूं’? वह मरे हुओं के नहीं परंतु जीवितों के परमेश्वर हैं.” भीड़ उनकी शिक्षा को सुनकर चकित थी.