कभी मैं किसी क़ौम या सलतनत को पनीरी की तरह लगाने और तामीर करने का एलान भी करता हूँ। लेकिन अफ़सोस, कई दफ़ा यह क़ौम मेरी नहीं सुनती बल्कि ऐसा काम करने लगती है जो मुझे नापसंद है। इस सूरत में मैं पछताकर उस पर वह मेहरबानी नहीं करता जिसका एलान मैंने किया था।