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हिज़क़ियेल 18:32
किताब-ए मुक़द्दस
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क्योंकि मैं किसी की मौत से ख़ुश नहीं होता। चुनाँचे तौबा करो, तब ही तुम ज़िंदा रहोगे। यह रब क़ादिरे-मुतलक़ का फ़रमान है।
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हिज़क़ियेल 18:20
जिससे गुनाह सरज़द हुआ है सिर्फ़ उसे ही मरना है। लिहाज़ा न बेटे को बाप की सज़ा भुगतनी पड़ेगी, न बाप को बेटे की। रास्तबाज़ अपनी रास्तबाज़ी का अज्र पाएगा, और बेदीन अपनी बेदीनी का।
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हिज़क़ियेल 18:31
अपने तमाम ग़लत काम तर्क करके नया दिल और नई रूह अपना लो। ऐ इसराईलियो, तुम क्यों मर जाओ?
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हिज़क़ियेल 18:23
रब क़ादिरे-मुतलक़ फ़रमाता है कि क्या मैं बेदीन की हलाकत देखकर ख़ुश होता हूँ? हरगिज़ नहीं, बल्कि मैं चाहता हूँ कि वह अपनी बुरी राहों को छोड़कर ज़िंदा रहे।
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हिज़क़ियेल 18:21
तो भी अगर बेदीन आदमी अपने गुनाहों को तर्क करे और मेरे तमाम क़वायद के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारकर रास्तबाज़ी और इनसाफ़ की राह पर चल पड़े तो वह यक़ीनन ज़िंदा रहेगा, वह मरेगा नहीं।
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हिज़क़ियेल 18:9
वह मेरे क़वायद के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारता और वफ़ादारी से मेरे अहकाम पर अमल करता है। ऐसा शख़्स रास्तबाज़ है, और वह यक़ीनन ज़िंदा रहेगा। यह रब क़ादिरे-मुतलक़ का फ़रमान है।
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