प्रभु की खोज — Part 1नमूना

प्रभु की खोज — Part 1

दिन 1 का 30

उन्होंने चुप रहना चुना।

लाइब्रेरी में चुप रहना तो ठीक है, लेकिन अगर हम सोचें कि चुप रहकर परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं, तो उसका कोई फायदा नहीं।

मरकुस की किताब में हम एक घटना पढ़ते हैं। यीशु ने अपने चेलों से पूछा,

“जब तुम रास्ते में जा रहे थे, तब किस बात पर चर्चा कर रहे थे?”

लेकिन वे चुप रहे, क्योंकि रास्ते में वे आपस में बहस कर रहे थे कि उनमें सबसे बड़ा कौन है।

यीशु पहले से जानता था कि वे कैसी व्यर्थ और घमंडी बातें कर रहे थे। जब यीशु ने उनसे पूछा, तो उनकी चुप्पी ने ही उनके दिल का घमंड जाहिर कर दिया।

असल में, यह उनके लिए अवसर था कि वे अपने पाप को मान लें और सच्चाई से जवाब दें। वही अवसर आज हमें भी मिलता है। जब हम गलती करते हैं, तो हमारे पास दो रास्ते होते हैं—

या तो हम चुप रहें और उसे छिपाने की कोशिश करें,

या ईमानदारी से मान लें और क्षमा पाएं।

तो, थोड़ा रुककर सोचिए—परमेश्वर के सामने सच्चे और ईमानदार होने का असली मतलब आपके लिए क्या है?

“ये सन्देश है नैंसी डिमोसवोल्गेमुथ की तरफ से,जो आप तक लाया गया है दिल जागृति के माध्यम से”

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पवित्र शास्त्र

इस योजना के बारें में

प्रभु की खोज — Part 1

परमेश्वर को आपको बदलने दें — एक मिनट एक समय पर! नैन्सी डीमॉस वोल्गेमुथ के इन छोटे लेकिन गहरे विचारों को सुनिए।

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