1 तीमुथियुस तीमुथियुस के नाम प्रेरित पौलुस की पहली पत्री
तीमुथियुस के नाम प्रेरित पौलुस की पहली पत्री
तीमुथियुस के नाम प्रेरित पौलुस की पहली पत्री का लेखक पौलुस था जिसे उसने एक युवा मसीही तीमुथियुस को संबोधित करते हुए कारावास से लिखा। तीमुथियुस एशिया माइनर का निवासी था और एक यूनानी पिता तथा विश्वासी यहूदी स्त्री का पुत्र था (प्रेरित 16:1)। पौलुस तीमुथियुस को “विश्वास में मेरा सच्चा पुत्र” कहता है (1:2)। पौलुस ने तीमुथियुस को इफिसुस की कलीसिया की देखभाल करने की जिम्मेदारी दी थी (1:3)। फिर जब उसे यह एहसास हुआ कि वह निकट भविष्य में इफिसुस लौट नहीं पाएगा तो उसने तीमुथियुस को उस कलीसिया की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी (3:14–15)। तीमुथियुस पौलुस की प्रचार यात्राओं में भी उसके साथ था और उसके पहले कारावास में उसका साथी था (फिलि 1:1; कुलु 1:1; फिलेमोन पद 1)।
इस पत्री का मुख्य उद्देश्य कलीसिया में व्याप्त झूठी शिक्षा के विरुद्ध लोगों को सचेत करना था। यहूदी और गैरयहूदी विचारों के मिश्रण पर आधारित यह शिक्षा इस बात पर बल देती थी कि वर्तमान भौतिक संसार बुरा है और एक व्यक्ति तभी उद्धार पा सकता है जब वह एक विशेष गुप्त ज्ञान को प्राप्त कर ले, और कुछ खाद्य-पदार्थों का सेवन न करे तथा अविवाहित रहने जैसी रीतियों का पालन करे। यह पत्री कलीसियाई प्रबंधन और आराधना से संबंधित निर्देश भी देती है जिसमें पौलुस दर्शाता है कि कलीसिया के अगुवों और सेवकों का जीवन-चरित्र कैसा होना चाहिए। अंततः पौलुस तीमुथियुस को इस विषय में परामर्श देता है कि कैसे वह यीशु मसीह का एक अच्छा सेवक बन सकता है और विश्वासियों के विभिन्न समूहों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सकता है।
रूपरेखा
1. भूमिका 1:1–2
2. झूठे शिक्षकों के विरुद्ध चेतावनी 1:3–20
3. कलीसियाई प्रबंधन के विषय में निर्देश 2:1—3:16
4. झूठी शिक्षा के विषय में निर्देश 4:1–16
5. कलीसिया में पाए जानेवाले विभिन्न समूहों के विषय में निर्देश 5:1—6:2
6. तीमुथियुस को उसके सेवाकार्य के विषय में दिए गए अन्य निर्देश 6:3–21
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