मत्ती 5
HINDI-BSI

मत्ती 5

5
यीशु का पहाड़ी उपदेश
1वह इस भीड़ को देखकर पहाड़ पर चढ़ गया,#मत्ती 15:29; मर 3:13; यूह 6:3,15 और जब बैठ गया तो उसके चेले उसके पास आए। 2और वह अपना मुँह खोलकर#मत्ती 13:35 उन्हें यह उपदेश#मत्ती 4:23; 7:29; मर 12:35; यूह 8:2 देने लगा :
धन्य वचन
(लूका 6:20-23)
3“धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।#भजन 40:17; 51:17; नीति 16:19; 29:23; यशा 66:2; मत्ती 19:14; मर 10:14
4“धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शांति पाएँगे।#यशा 61:2,3; यूह 16:20; प्रका 7:17
5“धन्य हैं वे, जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।#भजन 37:11; 25:9; 147:6; यशा 29:19
6“धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्‍त किए जाएँगे।#यशा 55:1,2; लूका 1:53; यूह 4:14; 6:48-51; 7:37,38
7“धन्य हैं वे, जो दयावन्त हैं, क्योंकि उन पर दया की जाएगी।#भजन 41:1; नीति 11:17; मत्ती 18:33-35; मर 11:25; याकू 2:13
8“धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे।#भजन 24:3,4; 73:1; इब्रा 12:14; 1 यूह 3:2,3; प्रका 22:4
9“धन्य हैं वे, जो मेल करानेवाले हैं, क्योंकि वे परमेश्‍वर के पुत्र कहलाएँगे।#मत्ती 5:44,45; रोम 8:14; 14:19; याकू 3:18
10“ धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।#2 कुरि 4:17; याकू 1:2,12; 1 पत 3:14; 4:13,14
11“धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें।#यशा 51:7; यूह 15:20,21; 1 पत 4:14 12तब आनन्दित और मगन होना, क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है। इसलिये कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्‍ताओं को जो तुम से पहले थे इसी रीति से सताया था।#2 इति 36:16; नहे 9:26; मत्ती 6:1; 23:31,37; प्रेरि 5:41; 7:52; 2 कुरि 12:10; 1 थिस्स 2:15; इब्रा 11:36-40; याकू 1:2; 5:10,11; 1 पत 1:6; 4:13
नमक और ज्योति
(मर 9:50; लूका 14:34,35)
13“तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इसके कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए।#कुलु 4:6 14तुम जगत की ज्योति हो। जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता।#नीति 4:18; यूह 8:12; 9:5; 12:35,36,46; इफि 5:8,9; फिलि 2:15; 1 थिस्स 5:5 15और लोग दीया जलाकर पैमाने#5:15 यूनानी मोडियन; वह बरतन जिससे डेढ़ मन अनाज नापा जाता था; मर 4:21; लूका 8:16; 11:33 के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उस से घर के सब लोगों को प्रकाश पहुँचता है। 16उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने ऐसा चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें।#मत्ती 9:8; यूह 15:8; 1 कुरि 10:31; इफि 5:8,9; फिलि 1:11; 1 पत 2:12
व्यवस्था की शिक्षा
17“यह न समझो, कि मैं व्यवस्था या भविष्यद्वक्‍ताओं की पुस्तकों#रोम 3:31; 10:4-10 को लोप करने आया हूँ, लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ। 18क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा।#भजन 119:89; यशा 40:8; 55:11; मत्ती 24:35; मर 13:31; लूका 16:17; 21:33 19इसलिये जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, और वैसा ही लोगों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा; परन्तु जो कोई उन आज्ञाओं का पालन करेगा और उन्हें सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान् कहलाएगा।#याकू 2:10 20क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, कि यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता#मत्ती 18:3; लूका 18:11,12; यूह 3:5; रोम 3:20; 10:3 से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।
क्रोध और हत्या
21“तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि ‘हत्या न करना#निर्ग 20:13; 21:12; लैव्य 24:17; व्य 5:17 ’, और ‘जो कोई हत्या करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा।’ 22परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा,#भजन 37:8; नीति 14:17,29; 16:32; 19:11; सभो 7:9; गला 5:20,21; इफि 4:26; याकू 1:19,20 वह कचहरी#व्य 16:18 में दण्ड के योग्य होगा, और जो कोई अपने भाई को निकम्मा#5:22 मूल शब्द राका कहेगा वह महासभा#5:22 मूल शब्द सैन्इड्रिन, यहूदियों का सर्वोच्‍च न्यायालय; मत्ती 26:59; यूह 11:47 में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे ‘अरे मूर्ख’ वह नरक की आग#मत्ती 18:9; मर 9:43,48; लूका 12:5; 16:24; याकू 3:6 के दण्ड के योग्य होगा। 23इसलिये यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहाँ तू स्मरण करे, कि तेरे भाई के मन में तेरे लिये कुछ विरोध#मर 11:25 है, 24तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप#रोम 12:17,18; 14:19 कर और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा। 25जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग ही में है,#नीति 25:8,9; लूका 12:58,59 उस से झटपट मेल मिलाप कर ले कहीं ऐसा न हो कि मुद्दई तुझे हाकिम को सौंपे, और हाकिम तुझे सिपाही को सौंप दे, और तू बन्दीगृह में डाल दिया जाए। 26मैं तुझ से सच कहता हूँ कि जब तक तू कौड़ी-कौड़ी भर न दे तब तक वहाँ से छूटने न पाएगा।
व्यभिचार
27“तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘व्यभिचार न करना।’#निर्ग 20:14; व्य 5:18 28परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्‍टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका।#अय्यू 31:1; मत्ती 15:19; याकू 1:14,15 29यदि तेरी दाहिनी आँख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकालकर फेंक दे; क्योंकि तेरे लिये यही भला है कि तेरे अंगों में से एक नष्‍ट हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए।#मत्ती 18:9; मर 9:47; कुलु 3:5 30यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उस को काटकर फेंक दे; क्योंकि तेरे लिये यही भला है कि तेरे अंगों में से एक नष्‍ट हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए।#मत्ती 18:8; मर 9:43
तलाक
(मत्ती 19:9; मर 10:11,12; लूका 16:18)
31“यह भी कहा गया था, ‘जो कोई अपनी पत्नी को तलाक देना चाहे, तो उसे त्यागपत्र दे।’#व्य 24:1-4; मत्ती 19:7; मर 10:2-4 32परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ कि जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से तलाक दे, तो वह उससे व्यभिचार करवाता है; और जो कोई उस त्यागी हुई से विवाह करे, वह व्यभिचार करता है।#मत्ती 19:9; मर 10:11,12; लूका 16:18; 1 कुरि 7:10-12
शपथ
33“फिर तुम सुन चुके हो कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था, ‘झूठी शपथ न खाना, परन्तु प्रभु के लिये अपनी शपथ को पूरी करना।’#लैव्य 19:12; गिन 30:2; व्य 23:21,23; मत्ती 23:16-22 34परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ कि कभी शपथ न खाना;#याकू 5:12 न तो स्वर्ग की, क्योंकि वह परमेश्‍वर का सिंहासन है;#यशा 66:1; प्रेरि 7:49 35न धरती की, क्योंकि वह उसके पाँवों की चौकी है; न यरूशलेम की, क्योंकि वह महाराजा का नगर#भजन 48:2 है। 36अपने सिर की भी शपथ न खाना क्योंकि तू एक बाल को भी न उजला, न काला कर सकता है। 37परन्तु तुम्हारी बात ‘हाँ’ की ‘हाँ,’ या ‘नहीं’ की ‘नहीं’ हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई#5:37 अर्थात्, शैतान की ओर से से होता है।#मत्ती 6:13; 13:19,38; यूह 17:15; 2 थिस्स 3:3; याकू 5:12; 1 यूह 2:13,14; 3:12; 5:18,19
प्रतिशोध
(लूका 6:29,30)
38“तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘आँख के बदले आँख, और दाँत के बदले दाँत।’#निर्ग 21:24; लैव्य 24:19,20; व्य 19:21 39परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।#लैव्य 19:18; नीति 24:29; यशा 50:6; विलाप 3:30; यूह 18:22,23; रोम 12:17,19; 1 कुरि 6:7; 1 पत 2:23; 3:9 40यदि कोई तुझ पर नालिश करके तेरा कुरता लेना चाहे, तो उसे दोहर भी ले लेने दे। 41जो कोई तुझे कोस भर बेगार में ले जाए, तो उसके साथ दो कोस चला जा। 42जो कोई तुझ से माँगे, उसे दे; और जो तुझ से उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।#व्य 15:7-11; 1 तीमु 6:18
शत्रुओं से प्रेम
(लूका 6:27,28,32-36)
43“तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।’#लैव्य 19:18; भजन 139:21,22; मत्ती 19:19; 22:39; मर 12:31; लूका 10:27; रोम 13:9; गला 5:14; याकू 2:8 44परन्तु मैं तुमसे यह कहता हूँ कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिए प्रार्थना करो,#निर्ग 23:4,5; नीति 25:21,22; लूका 23:34; प्रेरि 7:59,60; रोम 12:14,20; 1 कुरि 4:12; 1 पत 2:23 45जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भले और बुरे दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मी और अधर्मी दोनों पर मेंह बरसाता है।#प्रेरि 14:17; रोम 8:14 46क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेनेवाले#5:46 वे यहूदी जो रोमी सरकार के लिए चुंगी वसूल करने को नियुक्त किये जाते थे भी ऐसा ही नहीं करते?
47“यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते? 48इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।#उत्प 17:1; लैव्य 11:44; 19:2; व्य 18:13; मत्ती 19:21; 2 कुरि 7:1; इफि 5:1; कुलु 1:28; 4:12; याकू 1:4; 1 पत 1:15,16